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________________ गा० ५८] स्थितिसंक्रम-बुद्धि-निरूपण ३४१ दुगुंछाणं सव्वत्थोवा उक्कस्सिया वड्डी अवट्ठाणं च २७४. हाणिसंकमो विसेसाहिओ। २७५. एत्तो जहण्णयं । २७६. सव्वासि पयडीणं जहणिया वड्डी हाणी अवट्ठाण-ट्ठिदिसंकमो तुल्लो। एवं पदणिक्खेवो समत्तो। २७७. वड्डीए तिणि अणिओगद्दाराणि । २७८. समुकित्तणा परूवणा अप्पाबहुए त्ति । २७९. तत्थ समुकित्तणा । २८०, तं जहा । २८१. मिच्छत्तस्स असंखेज्जभागवड्डि-हाणी संखेज्जभागवडि-हाणी संखेज्जगुणवड्डि-हाणी असंखेज्जगुणहाणी अवट्ठाणं च । २८२. अवत्तव्यं णत्थि। २८३. सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं चउन्त्रिहा वड्डी चउव्विहा हाणी अवठ्ठाणमवत्तव्ययं च । २८४. सेसकम्माणं मिच्छत्तभंगो । २८५. णवरि अवत्तव्ययमत्थिं । चूर्णिसू०-नपुंसकवेद, अरति, शोक, भय और जुगुप्सा, इन कर्मों की उत्कृष्ट वृद्धि और अवस्थान संक्रमण सबसे कम है और हानिसंक्रमण विशेष अधिक है ।।२७३-२७४॥ चूर्णिसू०-अब इससे आगे जघन्य अल्पवहुत्व कहते है-सभी प्रकृतियोकी जघन्य स्थितिका वृद्धिसंक्रमण, हानिसंक्रमण और अवस्थानसंक्रमण परस्पर तुल्य है ।।२७५-२७६।। इस प्रकार पदनिक्षेप समाप्त हुआ। चूर्णिसू-पदनिक्षेपके विशेष कथन करनेरूप वृद्धिमें तीन अनुयोगद्वार है-समुत्कीर्तना, प्ररूपणा और अल्पवहुत्व । उनमेसे पहले समुत्कीर्तना की जाती है। वह इस प्रकार हैमिथ्यात्वकी असंख्यातभागवृद्धि होती है, असंख्यातभागहानि होती है, संख्यातभागवृद्धि होती है, संख्यातभागहानि होती है, संख्यातगुणवृद्धि होती है, संख्यातगुणहानि होती है, असंख्यातगुणहानि होती है और अवस्थान भी होता है। किन्तु मिथ्यात्वका अवक्तव्यसंक्रमण नहीं होता है ॥२७७-२८२।। __ चूर्णिस०-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वका चार प्रकारकी वृद्धिरूप, चार प्रकारकी हानिरूप संक्रमण तथा अवस्थानसंक्रमण और अवक्तव्यसंक्रमण होता है । शेष कर्मोंका संक्रमण मिथ्यात्वके समान जानना चाहिए । अर्थात् सोलह कपाय और नव नोकपार्योंका तीन वृद्धिरूप और चार हानिरूप संक्रमण और अवस्थान संक्रमण होता है। केवल इतना विशेप है कि इन कर्मोंका अवक्तव्यसंक्रमण होता है ।।२८३-२८५॥ १ कुदो, एदेसिमुक्कस्सवड्ढीए अवठ्ठाणस्स च पलिदोवमासखेजभागन्भहियवीससागरोवमकोडाकोडिपमाणत्तदसणादो । जयध २ केत्तियमेत्तेण ? अतोकोडाकोडिपरिहीणवीससागरोवमकोडाकोडिमेत्तण | जयघ० ३ कुदो, सव्वपयहीण जहण्णवडि-हाणि-अवहाणाणमेयटिदिपमाणत्तादो । जयध० ४ कुदो, असकमादो तस्स सकमपवुत्तीए सम्बद्धमणुवलंभादो । जयध० ५ विसजोयणापुव्वसजोगे सव्वोवसामणापडिवादे च तस्सभवो अत्थि त्ति एसो विसेसो। अण्ण च पुरिसवेद-तिण्ह सजलणाणमसखेज्ज गुणवढिसभवो वि अस्थि, उवसमसेढीए अप्पापणो णवकबधसंकमणावत्थाए काल काऊण देवेसुववण्णयस्मि तदुवलद्धीदो । जयध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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