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________________ गा० ५८] भुजाकारस्थितिसंक्रम-अल्पवहुत्व-निरूपण ३३५ मिच्छत्ताणं भुजगार-अवत्तव्यसंकाययंतरं केवंचिरं कालादो होदि ? २१५. जहण्णेणेयसमओ । २१६.उक्कस्सेण चउवीसमहोरत्ते सादिरेये' । २१७ अप्पयरसंकामयंतरं णत्थि अंतरं । २१८.अवद्विदसंकामयंतरं जहण्णेणेयसमयो । २१९. उक्कस्सेण अंगुलस्स असंखेज्जदिभागो । २२०. अणंताणुबंधीणं अवत्तव्यसंकामयंतरं जहण्णेणेयसमओ । २२१. उक्कस्सेण चउवीसमहोरत्ते सादिरेये । २२२. सेसाणं कम्माणमवत्तव्यसंकामयंतरं जहण्णेणेयसमओ । २२३. उकस्सेण संखेज्जाणि वस्ससहस्साणि । २२४. सोलसकसायणवणोकसायाणं भुजगार-अप्पदर-अवढिदसकामयाणं णस्थि अंतरं । २२५. अप्पाबहुअं । २२६. सव्वत्थोवा पिच्छत्तभुजगारसंकामयाँ । २२७. शंका-सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वके भुजाकार और अबक्तव्य-संक्रमण करनेवाले जीवोका अन्तरकाल कितना है ? ।।२१४।। समाधान-जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ अधिक चौवीस अहोरात्र ( दिन-रात ) है ॥२१५-२१६॥ चूर्णिसू०-उक्त दोनों प्रकृतियोके अल्पतर-संक्रमण करनेवालोका कभी अन्तर नहीं होता । इन्हीं दोनो प्रकृतियोके अवस्थित संक्रमण करनेवालोका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल अंगुलके असंख्यातवें भागप्रमाण है । अनन्तानुबन्धी कषायोके अवक्तव्यसंक्रामकोका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ अधिक चौबीस अहोरात्र है। शेप कर्मोंके अवक्तव्यसंक्रामकोका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल संख्यात सहस्र वर्ष है। सोलह कषाय, और नव नोकपायोके भुजाकार, अल्पतर और अवस्थित संक्रामकोका अन्तर नही होता है ॥२१७-२२४॥ चूर्णिसू०-अब भुजाकारादि संक्रमण करनेवाले जीवोंका अल्पबहुत्व कहते हैमिथ्यात्वके भुजाकार-संक्रामक सबसे कम है। इससे अवस्थित-संक्रामक असंख्यातगुणित १ कुदो, एत्तिएणुक्कस्सतरेण विणा पयदभुजगारावत्तव्वस कामयाण पुणरुभवाभावादो । जयघ० २ सम्मत्त-सम्मामिच्छत्तटिदिसतकम्मादो समयुत्तरमिच्छत्तछिदिसतकम्मियाण केत्तियाण पि जीवाण वेदयसम्मत्त प्पत्तिविदियसमए विवक्खियसक्रमपजाएण परिणमिय तदणतरसमए अतरिदाण पुणो अण्णजीवेहि तदणंतरोवरिमसमए अवदिपजायपरिणदेहि अंतरवोच्छेदे कदे तदुवलभादो । जयघ० ३ एत्तिएणुक्कस्सतरेण विणा समयुत्तरमिच्छत्तट्ठिदिसतकम्मेण सम्मत्तपडिलभस्स दुल्लहत्तादो । कुदो एव ? दुसमयुत्तरादिमिच्छत्तछिदिवियप्पाण सखेजसागरोवमकोडाकोडिपमाणाण सम्मत्त-सम्मामिच्छत्तभुजगारसकमहेऊण बहुलसभेवेण तत्थेव णाणाजीवाण पाएण सचरणोवलभादो। तदो तेहिं छिदिवियप्पेहि भूयो भूयो सम्मत्त पडिवजमाणणाणाजीवाणमेसो उक्कस्सतरसभवो दट्ठयो । जयध० ४ कुदो, सव्वद्धमेदेसु अणतस्स जीवरासिस्स जहापविभागमवाणदसणादो । जयध० ५ कुदो; दुसमयसचिदत्तादो । जयध० * ताम्रपत्रवाली प्रतिमें इससे आगे 'केवचिर कालादो होदि' इतना पाठ और अधिक मुद्रित है । (देखो पृ० १०९२ ) पर टोकाको देखते हुए वह नहीं होना चाहिए । ताडपत्रीय प्रतिसे भी उसकी पुष्टि नहीं हुई है।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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