SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 442
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३३४ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार समओ । २०३. उक्कस्सेण आवलियाए असंखेज्जदिभागो। २०४. अप्पयरसंकामया सव्वद्धा । २०५. सेसाणं कम्माणं भुजगार-अप्पयर-अवट्टिदसंकामया केवचिरं कलादो होंति ? २०६. सव्वद्धा । २०७. अवत्तव्यसंकामया केवचिरं कालादो होंति ? २०८. जहण्णणेयसमओं । २०९. उक्कस्सेण संखेज्जा समया । २१०. णवरि अणंताणुवंधीणमवत्तव्यसंकामया सम्मत्तभंगो । २११. णाणाजीवेहि अंतर । २१२. मिच्छत्तस्स भुजगार-अप्पदर-अवद्विदसंकामययंतर केवचिर कालादो होदि ? २१३. णत्थि अंतरं । २१४. सम्मत्त-सम्मा समाधान-जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल आवलीका असंख्यातवां भाग है ॥२०२-२०३।। चूर्णिम् ०-इन्हीं दोनो कर्मों के अल्पतरसंक्रामक जीव सर्व काल होते हैं ।।२०४।। शंका-शेष काँके भुजाकार, अल्पतर और अवस्थित संक्रामकोंका कितना काल है ? ॥२०५।। समाधान-सर्व काल है ।।२०६।। शंका-मोहनीयकी पच्चीस प्रकृतियोके अवक्तव्यसंक्रमणका कितना काल है ?॥२०७।। समाधान-जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल संख्यात समय है । केवल अनन्तानुबन्धी कषायोके अवक्तव्य-संक्रमणका काल सम्यक्त्वप्रकृतिके समय जानना चाहिए । अर्थात् चारित्रमोहनीयकी सभी प्रकृतियोके अवक्तव्य संक्रमणका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल आवलीका असंख्यातवॉ भाग है । ।।२०८-२१०॥ चूर्णिसू०-अब नाना जीवोकी अपेक्षा भुजाकारादि संक्रमणोका अन्तर कहते हैं ॥२११॥ शंका-मिथ्यात्वके भुजाकार अल्पतर और अवस्थित संक्रमण करने वालोका कितना अन्तरकाल है १ ॥२१२॥ समाधान-मिथ्यात्वके भुजाकार,अल्पतर और अवक्तव्य संक्रामकोका कभी अन्तर नहीं होता है ॥२१३॥ १ दोण्हमेदेसि कम्माणमेयसमय भुजगारादिसकामयत्तेण परिणदणाणाजीवाण विदियसमए सव्वेसिमेव सकामयपनायपरिणामे तदुवलद्धीदो । जयध० २ कुदो; णाणाजीवाणुसंधाणेण तेसिमेत्तियमेत्तकालावठाणोवलमाटो | जयध० ३ कुदो; मिच्छाइट्ठि-सम्माइट्ठीणं पवाहस्स तदप्पवरसकामयस्स तिसु विकालेसु णिरतरमवट्ठाणोवलभादो। जयध० ४ सव्व कालमविच्छिण्णसरूवेणेटेसिं सताणस समवट्ठाणादो । जयव० ५ उवसामणादो परिवडिदाणमणणुसविदसताणाणमेत्य जहण्णकालसभयो । तेसि चेव सखेजवारमणुसधिदसताणाणमवट्ठाणकालो । जयध ६ जद्दण्णेणेयसमओ, उकस्सेणावलियाए असखेजदिभागो इच्चेदेण भेदाभावादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy