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________________ २८२ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार होनेपर आठका संक्रमस्थान होता है ९ । संज्वलनमानके उपशम होनेपर सातका संक्रमस्थान पाया जाता है १० । दोनो मध्यम मायाकषायोके उपशम होने पर पॉचका संक्रमस्थान पाया जाता है ११ । संज्वलनमायाके उपशम होनेपर चारका संक्रमस्थान होता है १२ । दोनो मध्यम लोभोके उपशम होनेपर मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन दो ही प्रकृतियोका संक्रमण होता है १३ । इस प्रकार चौवीस-प्रकृतिक सत्त्वस्थानके साथ ऊपर वतलाये गये तेरह संकमस्थान पाये जाते है। इसी जीवके श्रेणीसे उतरते हुए जो संक्रमस्थान पाये जाते है, वे पुनरुक्त होनेसे उपर्युक्त संक्रमस्थानीके ही अन्तर्गत हो जाते है। तथा चौवीस प्रकृतियोकी सत्तावाले सम्यग्मिथ्याष्टिके इक्कीस-प्रकृतिक संक्रमस्थान और दर्शनमोहनीयका क्षपण करनेवाले जीवके मिथ्यात्वकी चरम फालीके पतनके अनन्तर पाया जानेवाला बाईसप्रकृतिक संक्रमस्थान भी पुनरुक्त होनेसे पृथक् नहीं कहा गया है। अब तेईसके सत्त्वस्थानके साथ संभव संक्रमस्थानोकी गवेषणा करते है-चौवीसकी सत्तावाले जीवके दर्शनमोहकी क्षपणाके लिए अभ्युद्यत होकर मिथ्यात्वका क्षपण कर देनेपर तेईसके सत्त्वस्थानके साथ वाईस-प्रकृतिक संक्रमस्थान पाया जाता है । पुनः उसीके द्वारा सम्यग्मिथ्यात्वको क्षपण करते हुए समयोन आवलीमात्र गोपुच्छाओके अवशिष्ट रहनेपर उसी तेईसके सत्त्वस्थानके साथ इक्कीस-प्रकृतिक संक्रमस्थान पाया जाता है २ । इस प्रकार तेईस-प्रकृतिक सत्त्वस्थानके साथ वाईस और इक्कीस-प्रकृतिक दो संक्रमस्थान पाये जाते हैं । इसी उपयुक्त जीवके द्वारा सम्यग्मिथ्यात्वके निःशेपरूपसे क्षय कर देनेपर वाईसके सत्त्वस्थान के साथ इक्कीस-प्रकृतिक एक ही संक्रमस्थान पाया जाता है। अब इक्कीसके सत्त्वस्थानके साथ संभव संक्रमस्थानोकी गवेपणा करते है-क्षायिकसम्यग्दृष्टिके इक्कीसके सत्त्वस्थानके साथ इक्कीस-प्रकृतिक संक्रमस्थान होता है १ । पुनः उसके उपशमश्रेणीपर चढ़कर आनुपूर्वी-संक्रमणके करनेपर इक्कीसके सत्त्वके साथ वीस-प्रकृतिक संक्रमस्थान पाया जाता है २ । इसी प्रकारसे इसके अनन्तर संभव दश संक्रमस्थानोका अनुमार्गण कर लेना चाहिए। इस प्रकार इक्कीसके सत्त्वके साथ उपशमश्रेणीकी अपेक्षा २१,२०,१९,१८,१२,११,९,८,६,५,३ और २ प्रकृतिक वारह संक्रमस्थान पाये जाते है। तथा क्षपकश्रेणीकी अपेक्षा आठ मध्यम कपायोका क्षपण करते हुए समयोन आवलीमात्र गोपुच्छाओके अवशिष्ट रहनेपर इक्कीसके सत्त्वके साथ तेरह-प्रकृतिक सत्त्वस्थान भी पाया जाता है। इसे पूर्वोक्त वारहमे मिला देनेपर कुल १३ संक्रमस्थान इक्कीसके सत्त्वस्थानके साथ पाये जाते हैं । पुनः उसी क्षपकके द्वारा आठो मध्यम कपायोके क्षपण कर देनेपर तेरह प्रकृठियोके सत्त्वस्थानके साथ तेरह-प्रकृतिक संक्रमस्थान पाया जाता है १ । पुनः उसी जीवके द्वारा अन्तकरण करनेके पश्चात् आनुपूर्वी-संक्रमण करनेपर तेरहप्रकृतिक सत्त्वस्थानके साथ वारह-प्रकृतिक संक्रमस्थान भी पाया जाता है २ । इस प्रकार तेरहके सत्त्वस्थानके साथ तेरह और वारह-प्रकृतिक दो संक्रमस्थान पाये जाते हैं । इसी जीवके द्वारा नपुंसकवेदका क्षयकर देनेपर वारहके सत्त्वस्थानके साथ ग्यारह-प्रकृतिक
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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