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________________ २६८ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार अट्ठ दुग तिग चदुक्के सत्त चउक्के तिगे च बोद्धव्वा। छक्कं दुगम्हि णियमा पंच तिगे एकग दुगे वा ॥३७॥ विशेषार्थ-इस गाथामें वारह, ग्यारह, दश और नौ-प्रकृतिक संक्रमस्थानोका संक्रमण किन-किन प्रतिग्रहस्थानोंमे होता है, यह बतलाया गया है। यथा-इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाला क्षपक आनुपूर्वी-संक्रमणका प्रारम्भ करके आठ मध्यम कपाय और संज्वलन-लोभको छोड़कर शेप वारह प्रकृतियोंका पुरुपवेद और चार संज्वलनरूप पाँच-प्रकृतिक प्रतिग्रहस्थानमे संक्रमण करता है । तथा उसी इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाले जीवके उपशमश्रेणीमे पुरुपवेदके उपशम-कालमे संज्वलनलोभके विना ग्यारह कपाय और पुरुषवेदका चार संज्वलनरूप चार-प्रकृतिक प्रतिग्रहस्थानमें संक्रमण होता है । क्षपकके नपुंसकवेदका क्षय हो जानेपर ग्यारह प्रकृतियोका पाँच-प्रकृतिक प्रतिग्रहस्थानमे संक्रमण होता है। अथवा चौवीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके दोनो क्रोधोके उपशम कर देनेपर और संज्वलनक्रोधके प्रतिग्रहप्रकृति न रहनेपर संज्वलनक्रोध, तीन मान, तीन माया, दो लोस, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वरूप ग्यारह प्रकृतियोका संज्वलनमान, माया, लोभ, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृतिरूप पॉच-प्रकृतिक प्रतिग्रहस्थानमे संक्रमण होता है । इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके आनुपूर्वी-संक्रमपूर्वक नव-नोकपायोका उपशम हो जानेपर तीन क्रोध, तीन मान, तीन माया और दो लोभरूप ग्यारह प्रकृतियोका चार संज्व. लनरूप चार-प्रकृतिक प्रतिग्रहस्थानमे संक्रमण होता है। तथा इसी जीवके क्रोध संज्वलनकी एक समय कम तीन आवलीप्रमाण प्रथमस्थितिके शेप रहनेपर उक्त ग्यारह प्रकृतियोका संज्वलन क्रोधके विना शेप तीन प्रकृतिल्प प्रतिग्रहस्थानमे संक्रमण होता है। चौवीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके तीन प्रकारके क्रोधके उपशम हो जानेपर तीन मान, तीन माया, दो लोभ, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दश प्रकृतियोका क्रोधके विना तीन संज्वलन, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृतिरूप पाँच-प्रकृतिक प्रतिग्रहस्थानमें संक्रमण होता है । तथा इसी जीवके मानसंज्वलनकी प्रथमस्थितिमे एक समय कम तीन आवली शेप रहनेपर उक्त दश प्रकृतियोका संज्वलन माया, लोभ, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृतिरूप चार-प्रकृतिक प्रतिग्रहस्थानमें संक्रम होता है। अथवा क्षपकके स्त्रीवेदका क्षय हो जानेपर पुरुपवेद, छह नोकपाय और लोभके विना तीन संचलन, इन दश प्रकृतियोका चार संज्वलनरूप चारप्रकृतिक प्रतिग्रहस्थानमे संक्रमण होता है । इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके दो प्रकारके क्रोधका उपशम हो जानेपर क्रोधसंज्वलन, तीन मान, तीन माया और दो लोभल्प नो प्रकृतियोका तीन प्रकारके संज्वलनरूप तीन-प्रकृतिक प्रतिग्रहस्थानमे संक्रमण होता है । आठ-प्रकृतिक स्थानका संक्रम दो, तीन और चार-प्रकृतिक प्रतिग्रह१ अट्ठ दुग तिग चउके सत्त चउक्के तिगे य बोद्धव्वा ।। छकं दुगम्मिणियमा पच तिगे एकग दुगे य ॥ २०॥ कम्मप० स०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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