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________________ गा० २२ ] क्षीण अक्षीणस्थितिक-स्वामित्व-निरूपण २२३ ट्ठिदिखंडयं संकुम्भमाणं संछुद्ध ताधे उकस्सयं तिण्हं पि झीणडिदियं । ७२. उक्कस्सयमुदयादो झीणडिदियं कस्स १७३. गुणिदकम्मंसियरस संजमा संजम संजम-दसणमोहtaraaणगुणढीओ एदाओ तिष्णि गुणसेढीओ काऊण असंजमं गदो, तस्स पढमसमयअसंजदस्स गुणसेडिसीसयाणि उदयमागदाणि तस्स अडकसायाणमुकस्सयमुदयादो भी ट्ठिदियं । ७४. कोहसंजणस्स उकस्सयमोकडणादितिन्हं पि शीणडिदियं कस्स १ ७५ गुणिदकम्मं सियरस कोधं खवेंतस्स चरिमट्ठि दिखंडय - चरिमसमय- असंगृहमाणयस्स उकस्यं तिन्हं पि झीणडिदियं । ७६. उकस्सयमुदयादो झीणडिदियं पि तस्सेव । ७७ एवं चेव माणसंजलणस्स | गवरि माणट्ठिदिकंडयं चरिमसमयअसंछुहमाणयस्स तस्स चत्तारि वि उक्कस्याणि झीणट्ठिदियाणि । ७८. एवं चेत्र मायासंजलणस्स । वह जिस समय आठो ही कपायोके संक्रम्यमाण अन्तिम स्थितिकांडकको संक्रान्त कर देता है, उस समय आठो कपायोका अपकर्षणादि तीनोकी अपेक्षा उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है ।। ७१ ।। शंका- उदयकी अपेक्षा आठो कपायोका उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाम किसके होता है || ७२ || समाधान - जो गुणितकर्माशिक जीव संयमासंयमगुणश्रेणी, सयंमगुणश्रेणी और दर्शनमोहनीयक्षपणा-सम्बन्धी गुणश्रेणी इन तीनो ही गुणश्रेणियोको करके असंयमको प्राप्त हुआ । उस प्रथमसमयवर्ती असंयतके जिस समय वे गुणश्रेणीशीर्षक उदयको प्राप्त हुए, उस समय उस असंयत के उदयकी अपेक्षा आठी कपायोका उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाय होता है ॥ ७३ ॥ शंका-संज्वलनक्रोधका अपकर्षणादि तीनोकी अपेक्षा उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशा किसके होता है ॥ ७४॥ समाधान - जो गुणितकर्माशिक जीव संञ्चलनक्रोधको क्षपण करते हुए क्रोधके अन्तिम स्थितिकish अन्तिम समयमे असंक्षोभकभावसे अवस्थित है, अर्थात् किसीका भी संक्रमण नहीं कर रहा है, उस समय उसके संज्वलनक्रोधका अपकर्षणादि तीनोकी अपेक्षा उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशा होता है || ७५ ॥ चूर्णिस० - संज्वलनक्रोधका उदयकी अपेक्षा उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक भी उस ही जीव के होता है । इसी प्रकारसे संज्चलनमानके उत्कृष्ट क्षीण स्थितिकको जानना चाहिए । विशेषता केवल यह है कि वह जिस समय मानको क्षपण करते हुए मानके अन्तिम स्थितिका क अन्तिम समयमे असंक्षोभकभावसे अवस्थित है, उस समय उसके अपकर्षणादि चारोकी ही अपेक्षासे उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेश होता है । इसी प्रकार संज्वलनमाचा उत्कुष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशको जानना चाहिए । विशेषता केवल यह कि वह जिस समय मानाको अपण करते हुए मायाके अन्तिम स्थितिकांडको अन्तिम सग अभाव जनयित
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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