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________________ कसायपाहुंडसुत्त कसायपाहुड पर एक दृष्टि १. नामकी सार्थकता-प्रस्तुत मूलग्रन्थका नाम यद्यपि श्री गुणधराचार्यने प्रथम गाथामे उद्गमस्थानकी अपेक्षा 'पेज्जदोसपाहुड' का संकेत करते हुए 'कसायपाहुड' ही दिया है, तथापि चूर्णिकार यतिवृपभने उसके दो नाम स्पष्ट रूपसे कहे हैं। यथा तस्स पाहुउस्स दुवे नामधेज्जाणि । तं जहा--पेज्जदोसपाहुडेत्ति वि, कसायपाहुडेचि वि । ( पेज्जदो० सू० २१ ) अर्थात् ज्ञानप्रवादपूर्वकी दशवीं वस्तुके उस तीसरे पाहुडके दो नाम है-पेज्जदोसपाहुड और कसायपाहुड। इनमें से प्रथम नामको चूर्णिकारने अभिव्याकरणनिष्पन्न और दूसरे नामको नयनिष्पन्न कहा है। किन्तु आगे चलकर सम्यक्त्व नामक अधिकारका प्रारम्भ करते हुए स्वयं चूर्णिकारने कसायपाहुड नामका ही निर्देश किया है । यथा कसायपाहुडे सम्मत्ते त्ति अणियोगद्दारे अधापवत्तकरणे इमारो चत्तारि सुत्तगाहारो परूवेयव्यानो । ( सम्यक्त्व० सू० १) तथा जयधवलाकारने प्रत्येक अधिकारके प्रारम्भमें और अन्तमें इसी नामका प्रयोग किया है । यहां तक कि पन्द्रहवें अधिकारकी चूलिका-समाप्ति पर 'एवं कसायपाहुडं समच' लिखकर प्रस्तुत ग्रन्थके कसायपाहुड नाम पर अपनी मुद्रा अकित कर दी है। परवर्ती आचार्यों और ग्रन्थकारोने भी अधिकतर इसी नामका उल्लेख किया है । ऐसी स्थितिमें यह प्रश्न किया जा सकता है कि फिर हमने इसका 'कसायपाहुडसुत्त' ऐसा नामकरण क्यों किया ? इस प्रश्नका उत्तर यह है कि यद्यपि १८० या २३३ गाथात्मक-ग्रन्थका नाम कसायपाहुड ही है, किन्तु प्रस्तुत सस्करणमें यह कसायपाहुड अपने ६ हजार श्लोक-प्रमित चूर्णिसूत्रोंके साथ मुद्रित है, अतएव उसके परिज्ञानार्थ 'कसायपाहुडसुत्त' ऐसा नाम दिया गया है। श्रा० वीरसेनने धवला और जयधवलाटीकामें नामैकदेशरूपसे 'पाहुडसुत्त' का पचासों वार उल्लेख किया है, तथा जिनसेनने जयधवलाकी प्रशस्ति में 'पाहुडसुत्ताणमिमा' जयधवला सएिणया टीका' कहकर 'पाहुडसुत्त' नामकी पुष्टि की है। २. मूलग्रन्थका प्रमाण-कसायपाहुडकी गाथा-संख्या वस्तुतः कितनी है, यह प्रश्न आज भी विचारणीय बना हुआ है। इसका कारण यह है कि प्रस्तुत ग्रन्थकी दूसरी गाथा 'गाहासदे असीदे' में स्पष्ट रूपसे १८० गाथाओंके १५ अर्थाधिकारोंमे विभक्त होनेका उल्लेख है । यह प्रश्न जयधवलाकार वीरसेनस्वामीके भी, सामने था और उनके सामने भी कितने ही आचार्य इस बातके कहनेवाले थे कि एकसौ अस्सी गाथाओको छोड़कर शेप ५३ गाथाएं नागहस्ती आचार्य-द्वारा रची हुई हैं । । किन्तु वीरसेनस्वामीने इस मतके खंडनमें जो युक्ति दी है, वह कुछ अधिक बलवती मालूम नहीं होती। वे कहते हैं कि यदि 'सम्बन्ध-गाथाओं, श्रद्धा 29 तत्तो सम्मत्ताणुभागो अणतगुणहीणो त्ति पाहुडसुत्ते रिणद्दिद्वत्तादो । धवला जीव० चू० । । असीदिसदगाहारो मोत्तूण अवसेससबधद्धापरिमाणणिद्देस-संकमणगाहामो जेण गागहत्यिप्रायरियकयानो, तेरण 'गाहासदे असीदे' त्ति भरिणदूण णागहत्यिनायरिएण पइज्जा कदा, इदि केवि . वक्खाणाइरिया भणति । जयघ० भा० १ पृ० १८३.
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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