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________________ गा० २२ ] उत्तरप्रकृतिप्रदेशविभक्ति-स्वामित्व-निरूपण १९५ ७८. चरिमसमय सवेदस्स एगं दयं । ७९. दुचरिमसमय सवेदस्स चरिमडिदिखंडगं चरिमसमयविणङ्कं । ८० तस्स दुचरिमसमयसवेदस्त जहणणगं संतकम्ममादि काढूण जाव पुरिसवेदस्स ओघुकस्सपदेस संतकम्मं त्ति एदमेगं फद्दयं । योगस्थान से लेकर सव योगस्थानोकी अपेक्षा सान्तर प्रदेशसत्कर्मस्थानोकी उत्पत्तिका निमित्त है । इस सूत्र के पञ्चात् 'जहा - जो चरमसमयसवेदेण ' इत्यादि सूत्रको आदि लेकर चार सूत्रो के द्वारा प्रथम बीजपदके निमित्तसे उत्पन्न हुए दो समय कम दो आवलीप्रमाण समय - aath प्ररूपणा की है । उन चार सूत्रोमेसे प्रथम सूत्रके द्वारा चरम समय के प्रदेशसत्कर्म - स्थानोका, दूसरे सूत्रसे द्विचरम समय के प्रदेशसत्कर्मस्थानोका और तीसरे सूत्र से त्रिचरम समयके प्रदेशसत्कर्मस्थानोका कथन करके चौथे सूत्रमे यह कहा कि 'इसी प्रकार शेप दो समय कम दो आवलीप्रमाण योगस्थानो के अनुसार प्रदेशसत्कर्मस्थानोको जानना चाहिए ।' सवेदी क्षपकके अन्तिम समयमे जघन्य योगस्थान से लेकर जितने योगस्थान संभव है, उतने ही अवेदीके चरम समयमे प्रदेशसत्कर्मस्थान होते हैं । इसका कारण यह है कि पृथक्-पृथक् योगस्थानोके द्वारा भिन्न-भिन्न समयप्रवद्धोका बन्ध होता है, और इसलिए उन समयप्रवद्धोका सत्त्व भी नाना प्रकारका होगा, जिसके कि कारण प्रदेश सत्कर्मस्थानोकी उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार सवेदीके उपान्त्य समयमे तत्प्रायोग्य जघन्य योगस्थानसे लेकर उत्कृष्ट योगस्थान तक जितने योगस्थान संभव है, उन योगस्थानो के द्वारा बन्धको प्राप्त हुए समयप्रबद्धोका सत्त्व अवेदी क्षपकके द्विचरम समय मे रहता है, और इन भिन्न-भिन्न समयप्रवद्धो के सत्त्वसे नानाप्रकारके प्रदेशसत्कर्मस्थान उत्पन्न होते है । इसी प्रकार सवेद के त्रिचरम समय मे योगस्थान के द्वारा बाँधे गये समयप्रबद्धोका सत्त्व अवेदी क्षपकके त्रिचरम समय मे प्राप्त होगा, जिनके निमितसे त्रिचरम समयमे प्रदेशसत्कर्मस्थानोकी उत्पत्ति होगी । इसी प्रकार दो समय कम दो आवलियोके समयोमे प्रदेश सत्कर्मस्थानोका कथन कर लेना चाहिए | ‘बन्धावली-प्रमाण अतीत समयप्रबद्धोका अन्य प्रकृतिमे संक्रमण होना', यह सान्तर प्रदेश सत्कर्मस्थानोका दूसरा वीजपद है । आगेके तीन सूत्रो के द्वारा इस दूसरे बीजपदके निमित्तसे प्रदेशसत्कर्मस्थानोका कथन करते है । चूर्णि स ० - चरमसमयवर्ती सवेदी क्षपकके एक सचेदीके चरमस्थितिकांडक चरमसमयमे विनष्ट होता है पुरुपवेदके जघन्य प्रदेशसत्कर्मस्थान से लेकर ओघ - उत्कृष्ट वह एक स्पर्धक है ॥ ७८-८० ॥ स्पर्धक है । द्विचरमममयवर्ती उस द्विचरमसमयवर्ती सवेदीके प्रदेशसत्कर्मस्थान तक जो द्रव्य है। विशेषार्थ-द्विचरमसमयवर्ती सवेदी क्षपकके जघन्य सत्कर्मस्थान से लेकर ओघ उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मस्थान तक एक स्पर्धक कहनेका कारण यह है कि यहॉपर जघन्य प्रदेशसत्कर्मस्थानसे लेकर उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मस्थान तक निरन्तर प्रदेशसत्कर्मस्थान पाये जाते हैं । कोई एक विवक्षित जीव जघन्य योगस्थान और जघन्य प्रकृत- गोपुच्छावाला है, उसकी प्रकृन-गोपुच्छाके
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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