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________________ १९४ कसाय पाहुड सुत्त [५ प्रदेशविभक्ति ६९. इमा अण्णा परूवणा । ७०. दोहि चरिमसमयसवेदेहि तुल्लजोगीहि बद्ध कम्मं तेसिं तं संतकम्म चरिमसमयअणिल्लेविदं पि तुल्लं । ७१. दुचरिमसमयअणिल्लेविदं पितुल्लं । ७२. एवं सव्वत्थ । ७३. एदाहि दोहि परूवणाहि पदेससंतकम्मट्ठाणाणि परूवेदव्याणि । ७४. जहा-जो चरिमसमयसवेदेण बद्धो समयपबद्धो तम्हि चरिमसमयअणिल्लेविदे घोलमाणजहणजोगट्ठाणमादि कादूण जत्तियाणि जोगट्ठाणाणि तत्तियसत्ताणि संतकम्मट्ठाणाणि । ७५. चरिमसमयसवेदेण उक्कस्सजोगेणेत्ति दुचरमसमयसवेदेण जहणजोगट्ठाणेणेत्ति एत्थ जोगट्ठाणमेत्ताणि [संतकम्मट्ठाणाणि] लभंति । ७६. चरिमसमयसवेदो उकस्सजोगो दुचरिमसमयसवेदो उकस्सजोगो तिचरिमसमयसवेदो अण्णदरजोगट्ठाणे त्ति । एत्थ पुण जोगट्ठाणमेत्ताणि पदेससंतकम्मट्ठाणाणि। ७७. एवं जोगट्ठाणाणि दोहि आवलियाहि दुसमयूणाहि पदुप्पण्णाणि *एत्तियाणि अवेदस्स संतकम्मट्ठाणाणि सांतराणि सव्याणि । चूर्णिसू०-अब उपर्युक्त प्ररूपणासे भिन्न दूसरी प्ररूपणा की जाती है-तुल्य योगवाले और चरमसमयवर्ती दो सवेदी क्षपकोके द्वारा वॉधा हुआ कर्म समान होता है, शथा चरम-समयमे अनिर्लेपित सत्कर्म भी उनका समान होता है। द्विचरम-समयमे अनिर्लेपित सत्कर्म भी समान होता है। त्रिचरम-समयमे अनिर्लेपित सत्कर्म भी समान होता है इस प्रकार बंधनेके प्रथम समय तक सर्वत्र अनिर्लेपित सत्कर्म समान जानना चाहिए । इस प्रकार इन दोनो प्ररूपणाओके द्वारा पुरुपवेदके प्रदेशसत्कर्मस्थानोकी प्ररूपणा करना चाहिए । वह इस प्रकार है-चरमसमयवर्ती सवेदी क्षपकने जो समयप्रबद्ध बॉधा है, उसे चरम समयमे अनिलेपित करनेपर अर्थात् चरमफालिमात्रके शेप रहने पर योदमानजघन्ययोगस्थानको आदि करके जितने योगस्थान होते है, उतने ही पुरुपवेदके सत्कर्मस्थान होते है ॥ ६९-७४ ॥ चूर्णिसू ०-जो जीव उत्कृष्ट योगी चरमसमयसवेदी है और जो जघन्य योगी द्विचरमसमयसवेदी है, उसके योगस्थान-प्रमाण पुरुपवेदके प्रदेशसत्कर्मस्थान होते है । जो जीव चरमसमयसवेदी उत्कृष्ट योगवाला है, जो द्विचरमसमयसवेदी उत्कृष्ट योगवाला है, त्रिचरमसमयसवेदी अन्यतर योगमे विद्यमान है, उनके योगस्थान-प्रमाण प्रदेशसत्कर्मस्थान होते है । इस प्रकार दो समय कम दो आवली-प्रमाण जो योगस्थान उत्पन्न किये गये हैं, उतने अवेदीके पुरुपवेदके सर्व सान्तर प्रदेशसत्कर्मस्थान होते है ।। ७५-७७ ।। विशेपार्थ-यहॉपर पुरुपवेदके जघन्य प्रदेशसत्कर्मस्थानोको वतलानकं लिए चूर्णिकारने 'एदाहि दोहि परूवणाहि पदेससंतकम्मट्ठाणाणि परूवेदव्याणि' इस सूत्रके द्वारा दो प्रकारकी प्ररूपणाके वीजपदोका संकेत किया है। उनमेसे 'एक समयप्रबहमे लेकर दो समय कम दो आवलीप्रमाण समयप्रवद्वोकी प्ररूपणा' यह प्रथम बीजपद है, क्योकि यह जघन्य ताम्रपत्रवाली प्रतिम इससे आगेके सूत्रागको टीकामें सम्मिलित कर दिया गया है। पर प्रकरण को देखते हुए यह सूत्राश ही होना चाहिए । ( देखो पृ० ८५६) । ० ॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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