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________________ १७६ कसाय पाहुड सुन्त एवं अणुभागे त्ति जं पदं तस्स अत्थपरूपणां समत्ता । अणुभागविहत्ती समत्ता । [ ४ अनुभाग विभक्ति • अनुभागबन्धके अध्यवसायस्थान असंख्यात लोकाकाशके प्रदेशप्रमित है । उद्वर्तना और अपवर्तना करणीके द्वारा होनेवाली वृद्धि और हानिसे जो अनुभागस्थान उत्पन्न होते है, वे हत - समुत्पत्तिकस्थान कहलाते हैं, क्योकि, हत नाम घातका है और उद्वर्तना अपवर्तना करणीके द्वारा पूर्व अवस्थाका घात होता है, इसलिए उनसे उत्पन्न होनेवाले परिणाम स्थान हत्तसमुत्पत्तिक कहलाते है । इनका प्रमाण बन्धसमुत्पत्तिकस्थानोसे असंख्यातगुणा है । इसका कारण यह है कि एक एक बन्धसमुत्पत्तिक स्थानपर नानाजीवोकी अपेक्षा उद्वर्तना और अपवर्तना करणोके द्वारा असंख्यात भेद कर दिये जाते है । उद्वर्तना और अपवर्तना करणीके द्वारा वृद्धिहानि किये जानेके पश्चात् स्थितिघात और रसघात से जो अनुभागस्थान उत्पन्न होते हैं, वे हतहतसमुत्पत्तिकस्थान कहलाते है, क्योकि, हत अर्थात् उद्वर्तना और अपवर्तन के द्वारा घात किये जानेपर, फिर भी हत अर्थात् स्थितिघात और रसघात के द्वारा किये जानेवाले घातसे इनकी उत्पत्ति होती है । इनका प्रमाण हतसमुत्पत्तिकस्थानोसे असंख्यातगुणा है, क्योकि, जीवो के संक्लेश और विशुद्धि प्रतिसमय अन्य अन्य होती है, और ये दोनो ही अनुभागघातके कारण है | इस प्रकार चौथी मूल गाथाके 'अणुभागे' इस पद के अर्थ की प्ररूपणा की गई । इस प्रकार अनुभागविभक्ति समाप्त हुई । काढूण जाव सणिपचिदियपजत्तसव्वुक्कराणुभागव घटाणेत्ति ताव एदाणि असखेज लोग मेत्तछट्टणाणि वधसमुप्पत्तियट्ठाणाणि त्ति भणति, वण समुप्पण्णत्तादो | अनुभागसतठाणवादेण नमुष्पष्णमणुभागसतट्ठाण त पि ववधट्ठाणाणि त्ति वेत्तव्य, बधट्ठाणसमाणत्तादो । पुणो एदेसिमस खेज लोगमेत्तछट्ठाणाण मज्ये अणत गुणवड्ढि अणतगुणहाणि अट्ठ कुव्वकाण विद्यालेमु असंखेज्जलोगमेत्तछट्टाणाणि हदसमुप्पत्तियसंतकम्मट्ठाणाणि भण्णति, वधट्टाणघादेण वधट्ठाणाण विद्याल्मु नचतरभावेण उप्पण्णत्ताटो । पुणो एदेसिमसंखेन लोगमेत्ताण हसमुत्पत्तियसतकम्मट्टाणाणमणं तगुणवड्ढि हाणि अट्ट कुव्यकाणं विद्याल्सु असखेज लोगमेत्तछट्ठाणाणि हृदहदसमुप्पत्तियसंतकम्मट्ठाणाणि वुञ्चति, घादेणुप्पण्ण-अणुभागट्टाणाणि वाणुभागट्ठाहितो विसरिसाण घाटिय बधसमुप्पत्तिय हदसमुत्पत्तिय-अणुभागट्टाणेहिंतो विसरिसभावेण उप्पाविदत्तादो | कथमेकादो जीवदव्वादो अणेयाणमणुभागट्टाणकजाण समुग्भवो ? ण, अणुभागवधघादबादहेदुपरिणामसजोएण गाणाव जाणनुपत्तीए विरोहाभावाटो । एदेसि तिविहाणमवि अणुभागट्टाणाण नही वेयणभावविहाणे पण कदा, तहा एत्थ विकावा | जय०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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