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________________ गा० २२ ) उत्तरप्रकृतिअनुभागविभक्तिअल्पवस्व निरूपण २७३ बंधिमाणजहणणाणुभागो अणंतगुणो। १६०. कोधस्स जहण्णाणुभागो विसेसाहिओ । १६१. मायाए जहण्णाणुभागो विसेसाहिओ। १६२. लोभस्स जहण्णओ अणुभागो विसेसाहिओ। १६३. हस्सस्स जहण्णाणुभागो अणंतगुणो । १६४. रदीए जहण्णाणुभागो अणंतगुणो। १६५. दुगुंछाए जहण्णाणुभागो अणंतगुणो। १६६. भयस्स जहण्णाणुभागो अणंतगुणो। १६७. सोगस्स जहण्णाणुभागो अणंतगुणो। १६८. अरदीए जहण्णाणुभागो अणंतगुणो । १६९ अपच्चक्खाणमाणस्स जहण्णाणुभागो अणंतगुणो । १७०. कोधस्स जहण्णाणुभागो विसेसाहिओ। १७१. मायाए जहण्णाणुभागो विसेसाहिओ । १७२. लोभस्स जहण्णाणुभागो विसेसाहिओ । १७३ पचवखाणमाणस्स जहण्णाणुभागो अणंतगुणो। १७४. कोधस्स जहण्णाणुभागो विसेसाहिओ । १७५. मायाए जहण्णाणुभागो विसेसाहिओ । १७६. लोभस्स जहण्णाणुभागो विसेसाहिओ। १७७.मिच्छत्तस्स जहण्णाणुभागो अणंतगुणो । अनुभागसे अनन्तानुवन्धीमानका जघन्य अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा होता है। अनन्तानुवन्धी मानके जघन्य अनुभागसे अनन्तानुबन्धी क्रोधका जघन्य अनुभागसत्कर्म विशेष अधिक होता है । अनन्तानुबन्धी क्रोधके जघन्य अनुभागसे अनन्तानुवन्धी मायाका जघन्य अनुभागसत्कर्म विशेप अधिक होता है । अनन्तानुबन्धी मायाके जघन्य अनुभागसे अनन्तानुबन्धी लोभका जघन्य अनुभागसत्कर्म विशेप अधिक होता है । अनन्तानुबन्धी लोभके जघन्य अनुभागमे हास्यप्रकृतिका जघन्य अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा है । हास्यप्रकृतिके जघन्य अनुभागमे रतिप्रकृतिका जघन्य अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा है। रतिप्रकृति के जघन्य अनुभागमे जुगुप्सा प्रकृतिका जघन्य अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा है। जुगुप्साप्रकृतिके जघन्य अनुभागसे भयप्रकृतिका जघन्य अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा है । भयप्रकृतिके जघन्य अनुभागसे शोकप्रकृतिका जघन्य अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा है। शोकप्रकृतिके जघन्य अनुभागने अरतिप्रकृतिका जघन्य अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा है । अरतिप्रकृतिके जघन्य अनुभागसे अप्रत्याख्यानावरण मानका जघन्य अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा है । अप्रत्याख्यानावरण मानके जघन्य अनुभागमे अप्रत्याख्यावरण क्रोधका जघन्य अनुभागसत्कर्म विशेप अधिक है । अप्रत्याख्यानावरण क्रोधके जघन्य अनुभागसे अप्रत्याख्यानावरण मायाका जघन्य अनुभागसत्कर्म विशेष अधिक है। अप्रत्याख्यानावरण मायाके जघन्य अनुभागसे अप्रत्याख्यानावरण लोभका जघन्य अनुभागसत्कर्म विशेप अधिक है । अप्रत्याख्यानावरणलोभके जघन्य अनुभागसे प्रत्याख्यानावरण मानफा जघन्य अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा है। प्रत्याख्यानावरण मानके जघन्य अनुभागमे प्रत्याख्यानावरण क्रोधका जघन्य अनुभागसत्कर्म विशेष अधिक है। प्रत्यारयानावरणमोधक जघन्य अनुभागसे प्रत्याख्यानावरण मायाका जघन्य अनुभागसत्कर्म विशेप अधिक है । प्रत्यारख्यानावरण मायाके जघन्य अनुभागमे प्रत्याख्यानावरण लोभका जघन्य अनुभागमकर्म विशेष अधिक है । प्रत्याख्यानावरण लोभके जघन्य अनुभागमे मिथ्यात्वप्रकृतिका जघन्य अनुभाग
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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