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________________ गा० २२ ] - एसरप्रकृतिअनुभागधिभक्ति अल्पयाहुत्व-निरूपण १७१ १४८. अप्पाबहुअमुक्कस्सयं जहा उक्कस्सबंधे तहा । १४९. णवरि सव्वपच्छा सम्मामिच्छत्तमणताणहीणं । १५०. सम्मत्तमणंतगुणहीणं । अब अनुभागसत्कर्मविभक्तिका अल्पबहुत्व कहा जाता है। वह जघन्य और उत्कृष्ट के भेदसे दो प्रकारका है । उनमेंसे पहले उत्कृष्ट अनुभागविभक्तिका अल्पवहुत्व कहने के लिए चूर्णिकार उत्तरसूत्र कहते है चूर्णिसू०-अनुभागसत्कर्मसम्बन्धी उत्कृष्ट अल्पबहुत्व जिस प्रकार पहले उत्कृष्ट अनुभागबन्धमे कह आए है, उसी प्रकार यहॉपर भी जानना चाहिए । केवल उससे विशेषता यह है कि यहॉपर सबसे पीछे सम्यग्मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा हीन है और उससे सम्यस्त्वकृतिका उत्कृट अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा हीन है, ऐसा कहना चाहिए ।।१४८-१५०॥ विशेपार्थ-पहले उत्कृष्ट अनुभागवन्धके प्ररूपण करते समय जो अल्पबहुत्व कहा है, वही यहाँ अनुभागसत्कर्मके प्ररूपणावसर पर भी कहना चाहिए । केवल सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व, इन दोनोका अनुभागसत्कर्मसम्बन्धी अल्पबहुत्व सबसे पीछे कहना चाहिए । इसका कारण यह है कि इन दोनो प्रकृतियोकी गणना बन्ध प्रकृतियोमे नहीं है, इसलिए वहॉपर इनका अल्पबहुत्व नही बतलाया गया। किन्तु मिथ्यादृष्टि जीवके सम्यग्दृष्टि होनेपर मिथ्यात्वके अनुभागका इन दोनों प्रकृतियोंमे संक्रमण हो जाता है, इसलिए उनके अनुभागका सत्त्व पाया जाता है और इसी कारण यहॉपर उनके अनुभागसत्कर्मसम्बन्धी अल्पबहुत्वका कहना आवश्यक हो जानेसे चूर्णिकारने 'णवरि " इत्यादि दो सूत्र निर्माण कर उसकी प्ररूपणा की है । इस प्रकारले सूचित किया गया वह अलमबहुत्व इस प्रकार जानना चाहिए मिथ्यात्वकर्मका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म आगे कहे जानेवाले सर्वपदोकी अपेक्षा सबसे तीव्र होता है। उससे अनन्तानुबन्धी लोभकपायका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा हीन होता है । इससे अनन्तानुबन्धी माया, क्रोध और मानकपायके उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म उत्तरोत्तर विशेप विशेष हीन होते हैं । अनन्तानुबन्धी मानके उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्मसे लोभसंज्वलनका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा हीन होता है, इससे संचलन माया, क्रोध और मानकपायके उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म उत्तरोत्तर विशेप-विशेप हीन होते हैं। संज्वलन मानके उत्कृष्ट अनु. भागसत्कर्मसे प्रत्याख्यानावरण लोभका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा हीन होता है । इससे प्रत्याख्यानावरण माया, क्रोध और मानकपायके उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म उत्तरोत्तर विशेष विशेष हीन होते हैं। प्रत्याख्यानावरण मानके उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्मसे अप्रत्याख्यानावरण लोभका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा हीन होता है । इससे अप्रत्याख्यानावरण माया, प्रोध और मानकपायके उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म उत्तरोत्तर विशेप हीन होते हैं । अप्रत्याख्यानावरणमानके उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्मसे नपुंसकोदका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा हीन होता है । उससे अरतिप्रकृतिका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म अनन्तगुणा हीन होता है। इसने शोक.
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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