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________________ गा० २२] उत्तरप्रकृतिअनुभागविभक्ति-स्वामित्व-निरूपण वा चउरिदिओ वा असण्णी वा सण्णी वा सुहुमो वा बादरो वा पज्जत्तो वा अपज्जत्तो वा जहण्णाणुभागसंतकम्मिओ होदि । ३८. एवमट्टकसायाणं। ३९. सम्मत्तस्स जहण्णयमणुभागसंतकम्यं कस्स ? ४०. चरिमसमय अक्खीणदंसणमोहणीयस्स । ४१. सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णयमणुभागसंतकम्म कस्म ? ४२. अवणिज्जमाणए अपच्छिमे अणुभागकंडए वट्टमाणस्स । ४३. अणंताणुबंधीणं जहणयमणुभागसंतकम्मं कस्स ? ४४. पढमसमयसंजुत्तस्स । ४५. कोधसंजलणम्स एकेन्द्रिय, अथवा द्वीन्द्रिय, अथवा त्रीन्द्रिय, अथवा चतुरिन्द्रिय, अथवा असंनी पंचेन्द्रिय, अथवा संज्ञी पंचेन्द्रिय, अथवा सूक्ष्मकायिक, अथवा बादरकायिक, अथवा पर्याप्तक, अथवा अपर्याप्तक जीवोमे उत्पन्न होकर मिथ्यात्वके जघन्य अनुभागसत्कर्मका स्वामी रहता है।॥३७॥ विशेषार्थ-विवक्षित जघन्य अनुभागसत्कर्मके घात करनेपर जो अनुभाग अवशिष्ट रहता है उसे हतसमुत्पत्तिककर्म कहते है। इस प्रकारके अनुभागसत्कर्मके साथ वह सूक्ष्म जीव मरणकर एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और सकलेन्द्रियोमे सम्भव बादर-सूक्ष्म, पर्याप्तकअपर्याप्तक और संजी-असंजी आदि किसी भी जातिके जीवोमे उत्पन्न हो सकता है। और वहॉपर भी वह मिथ्यात्वप्रकृतिके जघन्य अनुभागसत्कर्मका स्वामी रहता है। यहॉपर इतना विशेप जानना चाहिए कि देव, नारकी और असंख्यात वर्षकी आयुवाले भोगभूमियाँ मनुष्य तिर्यंच जीवीके मिथ्यात्वप्रकृतिका जघन्य अनुभाग नहीं पाया जाता, क्योकि, सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव मरण करके उनमे उत्पन्न नहीं होते, ऐसा नियम है। चूर्णिसू०-जिस प्रकार मिथ्यात्वप्रकृतिके जघन्य अनुभागसत्कर्मकी प्ररूपणा की है, उसी प्रकार अप्रत्याख्यानावरण आदि आठ कयायोके जघन्य अनुभागसत्कर्मकी भी प्ररूपणा करना चाहिए । सम्यक्त्वप्रकृतिका जघन्य अनुभागसत्कर्म किसके होता है ? चरमसमयवर्ती अक्षीणदर्शनमोहनीय कर्मवाले जीवके होता है ॥३८-४०॥ विशेषार्थ-दर्शनमोहनीयका क्षपण करते समय अधःप्रवृत्तकरण और अपूर्वकरणको करके अनिवृत्तिकरणके कालमे संख्यात भागोके व्यतीत हो जानेपर मिथ्यात्वको सम्यग्मिथ्यात्वमे संक्रमण कर पुनः सम्यग्मिथ्यात्वको भी अन्तर्मुहूर्तके द्वारा सम्यक्त्वप्रकृतिमें सक्रमण कर आठ वर्पप्रमाण स्थितिसत्त्वको करके प्रतिसमय अपवर्तनाके द्वारा सम्यक्त्वप्रकृतिके अनुभागसत्त्वको तबतक वरावर घातता जाता है, जबतक कि वह दर्शनमोह-क्षपण करनेके अन्तिम समयको प्राप्त नहीं हो जाता है । क्योकि, दर्शनमोह-क्षपण करनेके अन्तिम समयमं ही उसके सम्यक्त्वप्रकृतिका सर्वजघन्य अनुभाग पाया जाता है ।। चूर्णिसू०-सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिका जघन्य अनुभागसत्कर्म किसके होता है । सम्यग्मिथ्यात्वका सम्यक्त्वप्रकृतिमे संक्रमण कर उसे अपनीत करनेवाले तथा अन्तिम अनुभागकांडकमे वर्तमान ऐसे जीवके सम्बग्मिथ्यात्वका जघन्य अनुभाग पाया जाता है। अनन्तानुवन्धी चारी कपायाका जघन्य अनुभागमत्कर्म किसके होता है ?-प्रथम ममयमे संयोजन करने २२
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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