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________________ १४० कसाय पाहुड सुत्त [ ३ स्थितिविभक्ति ३५३. अप्पाबहुअं । ३५४. मिच्छत्तस्स सव्वत्थोवा असंखेज्जगुणहाणिकम्संसिया । ३५५. संखेज्जगुणहाणिकम्मंसिया असंखेज्जगुणा । ३५६. संखेज्जभागहाणिकम्मंसिया संखेज्जगुणा । ३५७. संखेज्जगुणवडिकम्मंसिया असंखेज्जगुणा । ३५८. संखेज्जभागवह्निकम्मंसिया संखेजगुणा । ३५९. असंखेज्जभागवह्निकम्मंसिया अनंतगुणा । ३६०. अवद्विदकम्मंसिया असंखेज्जगुणा । ३६१. असंखेज्जभागहाणिकम्मंसिया संखेज्जगुणा । ३६२. एवं बारसकसाय- णवणोकसायाणं । ३६३. सम्मत्तसम्मामिच्छत्ताणं सव्वत्थोवा असंखेज्जगुणहाणिकम्मंसिया । ३६४. अवट्टिदकम्मंचूर्णिसू० [0- अव मोहप्रकृतियोकी वृद्धि-हानिरूप स्थितिविभक्तिका अल्पबहुत्व कहते है-मिथ्यात्वकर्मकी स्थितिविभक्तिके असंख्यातगुणहानि करनेवाले जीव आगे कहे जानेवाले पदोकी अपेक्षा सवसे कम है । क्योकि, दर्शनमोहकी क्षपणा करनेवाले जीव संख्यात ही होते है | असंख्यातगुणहानि करनेवाले जीवोसे संख्यातगुणहानि करनेवाले जीव असंख्यात - गुणित हैं । क्योकि, मिथ्यात्व की संख्यातगुणहानि करनेवाले जीव जगत्प्रतर के असंख्यातवे भागप्रति संज्ञी पर्याप्तक और अपर्याप्तक जीवोके असंख्यातवे भागप्रमाण हैं । संख्यातगुणहानि करनेवाले जीवोसे संख्यात भागहानि करनेवाले जीव संख्यातगुणित हैं ।। ३५३-३५६ ॥ विशेषार्थ - इसका कारण यह है कि तीव्र विशुद्धिसे परिणत जीवोकी अपेक्षा मध्यम विशुद्धिसे परिणत जीव संख्यातगुणित होते हैं । दूसरी बात यह है कि मिथ्यात्कर्मकी स्थितिविभक्ति-सम्बन्धी संख्यातगुणहानिको संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव ही करते है, किन्तु संख्यातभागहानिको तो संज्ञी पंचेद्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और द्वीन्द्रिय जीव भी करते है, इसलिए संख्यातगुणहानिविभक्ति करनेवाले जीवोसे संख्यात भागहानिविभक्ति करनेवाले जीव संख्यातगुणित सिद्ध होते है । 0 चूर्णिसू० - मिध्यात्वकर्मकी संख्या भागहानि करनेवाले जीवोंसे संख्यातगुणवृद्धि करनेवाले जीव असंख्यातगुणित हैं। मिध्यात्वकी संख्यातगुणवृद्धि करनेवाले जीवोसे संख्यातभागवृद्धि करनेवाले जीव संख्यातगुणित हैं । मिध्यात्वकी संख्यातभागवृद्धिवाले जीवोसे असंख्यातभागवृद्धि करनेवाले जीव अनन्तगुणित है । मिध्यात्वकी असंख्यात भागवृद्धिवाले जीवोसे अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीव असंख्यातगुणित हैं । मिथ्यात्वकी अवस्थितविभक्तिवाले जीवांसे मिथ्यात्वकी असंख्यात भागहानि करनेवाले जीव संख्यात्तगुणित हैं । जिस प्रकार से मिध्यात्वकर्मकी वृद्धि, हानि और अवस्थित स्थितिविभक्तिका अल्पबहुत्व कहा गया है, उसी प्रकार अप्रत्याख्यानावरण आदि वारह कषाय और नव नोकपायोका वृद्धि, हानि और अवस्थानसम्बन्धी अल्पबहुत्व जानना चाहिए || ३५७-३६२॥ अब सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृतिकी वृद्धि - हानिका अल्पबहुत्व कहते हैंचूर्णिसू० ० - सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन दो प्रकृतियो की असंख्यातगुणहानिहैं वाले जीव आगे कहे जानेवाले सर्व पदांकी अपेक्षा सबसे कम 1 असंख्यातगुणहानिवाले
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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