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________________ गा० २२ ] स्थितिविभक्ति-काल-निरूपण ૨૭ ३३१. एगजीवेण कालो । ३३२. मिच्छत्तस्स तिविहाए वड्डीए जहण्णेण एगसमओ । ३३३. उक्कस्सेण वे समया । ३३४. असंखेज्जभागहाणीए जहणेण एगसमओ । ३३५ उक्कस्सेण तेवट्टिसागरोवमसदं सादिरेयं । चूर्णसू ० - अब एक जीव- सम्बन्धी उक्त वृद्धि, हानि आदिके कालको कहते हैंभिध्यात्वकर्मकी असंख्यातभागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि और संख्यातगुणवृद्धि, इन तीनो प्रकार - की वृद्धिका जघन्यकाल एक समय है और उत्कृष्टकाल दो समय है ॥ ३३१-३३३॥ विशेषार्थ - अद्धाक्षय से अथवा संकुशक्षयसे किसी भी जीवके अपने विद्यमान स्थितिसत्त्व के ऊपर एक समय बढ़ाकर स्थितिवन्ध करके द्वितीय समय मे अल्पतर अथवा अवस्थितविभक्तिके करनेपर उक्त तीनो वृद्धियो के होनेका जघन्यकाल एक समय पाया जाता है । मिथ्यात्वकर्मकी उक्त तीनो प्रकारकी वृद्धिका उत्कृष्टकाल दो समय कहा है । उसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है - कोई एक एकेन्द्रिय जीव एक स्थितिको वांधता हुआ विद्यमान था । उस स्थिति के कालक्षयसे एक समय असंख्यात भागवृद्धिप्रमाण स्थितिको बांधकर फिर भी उसके द्वितीय समयमे संक्लेशक्षय से असंख्यात भागवृद्धिप्रमाण स्थितिबन्धकर तृतीय समय मे अल्पतर अथवा अवस्थित स्थितिबन्धके करनेपर असंख्यात भागवृद्धिका ढ़ो समय-प्रमाण उत्कृष्टकाल लब्ध हो जाता है । इसी प्रकार द्वीन्द्रियादि जीवोके भी दो समयोकी प्ररूपणा जानना चाहिए । चूर्णिसू० - मिथ्यात्वकर्मकी असंख्यात भागहानिकां जघन्यकाल एक समय है और उत्कृष्टकाल साधिक एक सौ तिरेसठ सागरोपम है ।। ३३४-३३५॥ विशेषार्थ-सम-स्थितिको वांधनेवाले किसी जीवके पुनः विद्यमान स्थितिसत्त्वसे नीचे एक समय उत्तर करके स्थितिबन्ध कर तदनन्तर उपरिम समयमे विद्यमान स्थितिसत्त्वके समान स्थितिबन्धके करनेपर असंख्यात भागहानिका जघन्यकाल एक समयमात्र पाया जाता है । मिध्यात्वकर्मकी असंख्यात भागहानिका उत्कृष्टकाल सातिरेक एकसौ तिरेसठ सागरोपम है । उसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है- वृद्धि अथवा अवस्थित स्थितिविभक्तिमे विद्यमान कोई एक जीव सर्वोत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्तकाल तक अल्पतरस्थितिविभक्तिको करके वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त हुआ । पुनः पूर्वमे बतलाये गये क्रमसे दो बार छयासठ सागरोपमकाल तक परिभ्रमण कर तत्पश्चात इकतीस सागरोपमकी स्थितिवाले ग्रैवेयक देवोमे उत्पन्न हो मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ और वहाँ अपनी आयुको पूरी करके मरकर पूर्वकोटीकी आयुवाले मनुष्यों में उत्पन्न हुआ । वहाँ अन्तमुहूर्त के पश्चात् ही संक्लेगसे पूरित हो भुजाकारस्थितिबन्धको प्राप्त हुआ । इस प्रकार एक अन्तर्मुहूर्त से अधिक एकसौ तिरेसठ सागरोपमप्रमाण उत्कृष्टकाल होता है । उपर्युक्त प्रकार से मिथ्यात्व की असंख्यात भागहानिका उत्कृष्टकाल बतलानेके पश्चात् जयधवलाकार कहते हैं कि एक सौ तिरेसठ सागरोपमकालको जो अन्तर्मुहूर्तसे अधिक कहा गया है, वह कम है, अतः उसे न ग्रहणकर पल्योपमके असंख्यातवे भागसे अधिक कालको ग्रहण करना चाहिए । उसके लाने के लिए वे कहते है कि दो वार छयासठ सागरोपम परिभ्रमण करने के पूर्व विवक्षित १८
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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