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________________ १२४ कसाय पाहुड सुत्त [ ३ स्थितिविभक्ति होदि १ २३९. अण्णदरो रइयो तिरिक्खो मणुस्सो देवो वा । २४०. अवत्तन्वो णत्थि । २४१. सम्मत्त सम्मामिच्छत्ताणं भुजगार-अप्पदरविहत्तिओ को होदि १ २४२. अण्णदरो रहओ तिरिक्खो मणुस्सो देवो । २४३. अवट्टिदविहत्तिओ को होदि १ २४४. पुष्पणादो सम्मत्तादो समयुत्तरमिच्छत्तेण से काले सम्मत्तं पडिवण्णो सो अवट्टिदविहत्तिओ । २४५. अवत्तव्यविहत्तिओ अण्णदरो । २४६. एवं सेसाणं कम्माणं णेदव्वं । भी होती है और सम्यग्दृष्टि के भी । मिध्यात्वकी अवक्तव्यविभक्ति नही होती है । इसका कारण यह है कि मिथ्यात्वकर्मके निःसत्त्व हो जानेपर पुनः उसके सत्त्व होने का अभाव है ॥२३१-२४०॥ चूर्णिसू०० - सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दो प्रकृतियोंकी भुजाकार और अल्पतर विभक्तिको करनेवाला कौन जीव होता है ? कोई एक नारकी, तिर्यंच, मनुष्य अथवा देव होता है | यहाँ इतना विशेष है कि इन प्रकृतियोकी भुजाकारविभक्ति सम्यग्दृष्टि जीवोके ही होती है । किन्तु अल्पतरविभक्ति सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीवके होती हैं । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन दो प्रकृतियोकी अवस्थितविभक्ति करनेवाला कौन जीव होता है ? पूर्व में उत्पन्न सम्यक्त्वप्रकृति से एक समय अधिक मिथ्यात्वकी स्थिति के साथ जो जीव अनन्तर समयम सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ है, वह अवस्थित विभक्तिवाला होता है ॥२४१ - २४४ ॥ विशेषार्थ - जिस जीवने पहले कभी सम्यक्त्वको उत्पन्न किया है और परिणामोके निमित्तसे गिरकर मिध्यात्वमे आ गया है उसके विवक्षित समयमे सम्यक्त्वप्रकृतिका जितना स्थितिसत्त्व है, उससे उसीकी मिथ्यात्वप्रकृतिका स्थितिसत्त्व यदि एक समय अधिक हो और वह जीव पुनः तदनन्तरवर्ती द्वितीय समयमे ही सम्यक्त्वको प्राप्त हो, तो उसके सम्यक्त्व ग्रहण करनेके प्रथम समय मे सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दोनो प्रकृतियोकी अवस्थितविभक्ति होती है, क्योकि, चरम समयवर्ती मिध्यादृष्टिके स्थितिसत्त्वसे प्रथम समयवर्ती सम्यग्दृष्टिके सम्यक्त्वप्रकृतिका स्थितिसत्त्व समान पाया जाता है । चूर्णिसू० (० - सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दोनों प्रकृतियो की अवक्तव्यविभक्तिकरनेवाला कोई एक जीव होता है ।। २४५ ॥ विशेषार्थ - इसका कारण यह है कि किसी भी गतिवाले, किसी भी कपायके उदयवाले, किसी भी अवगाहनाको धारण करनेवाले, किसी एक लेग्यासे संयुक्त तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन दोनो प्रकृतियो की सत्ता से रहित ऐसे मिध्यादृष्टि जीवके प्रथमसम्यक्त्वके ग्रहण करनेपर अवक्तव्यभाव पाया जाता है । चूर्णि ० - इसी प्रकार शेप सोलह कपाय और नव नोकपाय, इन पीस कर्मोंकी '' ताम्रपत्रबाली मुद्रित प्रतिमें इसे चूर्णिसूत्र न मानकर जयधवला टीकाका अग बना दिया है । ( देखो पृष्ठ ३०६ पक्ति १७ ) १ भुजगार अवद्विदविहत्ती मिच्छाइट्टिस्सेव । अप्पदरविहत्ती सम्मादिट्टिस्स मिच्छा दिट्टित्य वा । जवघ २ भुजगार सम्मादिट्टीण चेत्र । अप्पटरं पुण सम्मादिट्टिस्त मिच्छादिहिस्स वा । जयध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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