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________________ ११९ गा० २२] स्थितिविभक्ति-सन्निकर्ष-निरूपण वा । २०४. उक्कल्सादो अणुक्कस्सा समऊणमादि कादूण जाव अंतोकोडाकोडि त्ति । २०५. अरदि-सोगाणं द्विदिविहत्ती किमुक्कस्सा, अणुक्कस्सा ? २०६. उक्करसा वा अणुक्कस्सा वा । २०७. उकस्सादो अणुक्कस्सा समऊणमादि कादूण जाव वीसं सागरोवमकोडाकोडीओ पलिदोवमस्स असंखेजदिभागेण ऊणाओ । २०८ भय-दुगुंछाणं हिदिविहत्ती किमुक्कस्सा अणुक्कस्सा ? २०९. णियमा उक्कस्सा । २१०. एवमरदि-सोगभय दुगुंछाणं पि । २११. प्रवरि विसेसो जाणियव्यो दो प्रकृतियोकी स्थितिविभक्ति क्या उत्कृष्ट होती है, अथवा अनुत्कृष्ट होती है ? उत्कृष्ट भी होती है और अनुत्कृष्ट भी होती है। इसका कारण यह है कि नपुंसकवेदकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्तिके होनेपर यदि हास्य और रतिप्रकृतिका बन्ध हो, तो उत्कृष्ट स्थिति पाई जाती है, और यदि उनका बन्ध नहीं हो, तो अनुत्कृष्ट स्थिति पाई जाती है । क्योंकि बन्धके नहीं होने पर हास्य और रतिप्रकृतिमे कपायस्थितिका संक्रमण नही होता है । वह अनुत्कृष्ट स्थिति उत्कृष्ट स्थितिमेसे एक समय कमसे लगाकर अन्तःकोडाकोड़ी सागरोपम तक होती है।।२०२-२०४॥ चूर्णिसू-नपुंसकवेदकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति करनेवाले जीवके अरति और शोक, इन दा प्रकृतियोकी स्थितिविभक्ति क्या उत्कृष्ट होती है, अथवा अनुत्कृष्ट होती है ? उत्कृष्ट भी होती है और अनुत्कृष्ट भी होती है । इसका कारण यह है कि नपुंसकवेदके वन्धकालमे अरति और शोक प्रकृति बन्धका बन्ध हो, तो उत्कृष्ट होती है, अन्यथा अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्ति होती है । वह अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्ति उत्कृष्ट स्थितिमेसे एक समय कमसे लगाकर पल्योपमके असंख्यातवे भागसे कम बीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम तक होती है ॥२०५-२०७॥ चूर्णिसू०-नपुंसकवेदकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति करनेवाले जीवके भय और जुगुप्सा, इन दो प्रकृतियोकी स्थितिविभक्ति क्या उत्कृष्ट होती है, अथवा अनुत्कृष्ट होती है ? नियमसे उत्कृष्ट होती है, क्योकि, ये प्रकृतियां ध्रुववन्धी है ॥२०८-२०९॥ चूर्णिसू०-जिस प्रकार नपुंसकवेदकी स्थितिविभक्तिका शेप सर्व मोह-प्रकृतियोकी स्थितिविभक्तिके साथ सन्निकर्प किया गया है, उसी प्रकार अरति, शोक, भय और जुगुप्सा, इन चार प्रकृतियोका भी स्थितिविभक्ति-सम्बन्धी सन्निकर्प करना चाहिए । किन्तु उनमे जो थोड़ी सी विशेषता है, वह जानना चाहिए ॥२१०-२११॥ विशेषार्थ-इस समर्पणसूत्रसे जिस विशेपताकी सूचना की गई है, वह इस प्रकार है-अरति और शोकप्रकृतिकी उत्कृष्ट स्थितिको निरुद्ध करके सन्निकर्पके कहनेपर मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृति और सोलह कपायांकी सन्निकर्पप्ररूपणा नपुंसकवेदके समान है, कोई विशेषता नहीं है। किन्तु स्त्रीवेदकी उत्कृष्ट स्थिति भी होती है और अनुत्कृष्ट स्थिति भी होती है । वह अनुत्कृष्ट अपनी उत्कृष्ट स्थितिमेसे एक समय कमसे लगाकर और कुछ आचार्योके मतसे अन्तर्मुहूर्त कमसे लगाकर अन्तःकोड़ाकोड़ी मागरोपम तकके प्रमाणवाली होती है । इसी प्रकार पुम्पवेदकी स्थितिविभक्तिका सन्निकर्प जानना चाहिए । नपुंमकवटकी
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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