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________________ गा० २२] स्थितिविभक्ति-नानाजीवापेक्षया काल-निरूपण ११४. जहण्णए पयदं । ११५ मिच्छत्त-सम्पत्त-बारसकसाय-तिवेदाणं जहण्णहिदिविहत्तिएहि णाणाजीवेहि कालो केवडिओ ? ११६. जहण्णेण एगसमओ । ११७. उक्कस्सेण संखेजा समया । ११८. सम्मामिच्छत्त-अणंताणुवंधीणं च उक्कस्सजहण्ण-द्विदिविहत्तिएहि णाणाजीवेहि कालो केवडिओ ? ११९. जहण्णेण एगसमओ । १२०. उक्कस्सेण आवलियाए असंखेजदिभागो। १२१. छण्णोकसायाणं जहण्णहिदिविहत्तिएहिणाणाजीवेहि कालो केवडिओ ? १२२. जहण्णुकस्सेण अंतोमुहत्तं ।* अब नानाजीवोकी अपेक्षा जघन्य स्थितिविभक्तिका काल कहते है चर्णिसू०-जघन्य स्थितिविभक्ति प्रकृत है। मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, अप्रत्याख्यानावरणादि बारह कषाय और तीनो वेद, इन प्रकृतियोकी जघन्य स्थितिविभक्तिका काल नानाजीवोकी अपेक्षा कितना है ? जघन्यकाल एक समय है और उत्कृष्टकाल संख्यात समय है ॥११४-११७॥ विशेषार्थ-इसका स्पष्टीकरण यह है कि इनकी द्विसमयकालवाली जघन्य निपेक स्थितिमेसे एक समयप्रमाणकाल ही प्रकृत है ओर इसका भी कारण यह है कि द्वितीय समयमे ही इन विवक्षित प्रकृतियोका निमूल विनाश पाया जाता है। इन्ही उक्त प्रकृतियोकी जघन्य स्थितिविभक्तिका उत्कृष्ट काल संख्यात समय है, क्योकि, मनुष्यपर्याप्तराशिसे विभिन्न समयोमे जघन्य स्थितिको प्राप्त होनेवाले नाना जीव संख्यात पाये जाते है । चूर्णिसू०-सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी चारो कपाय, इन प्रकृतियोकी जघन्य स्थितिविभक्तिका काल नानाजीवोकी अपेक्षा कितना है ? जघन्यकाल एक समय है । क्योकि, दोसमय-कालवाली एक निपेकस्थितिका द्वितीय समयमे परस्वरूपसे परिणमन पाया जाता है। इन्हीं पांचों प्रकृतियोकी जघन्य स्थितिविभक्तिका उत्कृष्टकाल आवलीका असंख्यातवाँ भाग है ॥११८-१२०॥ विशेपार्थ-इसका कारण यह है कि सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना करनेवाले और अनन्तानुबन्धी-कपायचतुष्ककी विसंयोजना करनेवाले पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण जीवोके आवलीके असंख्यातवे भागमात्र उपक्रमणकांडकोमेसे यहॉपर एक कांडकके उत्कृष्ट कालका ग्रहण किया गया है। चूर्णिसू०-हास्य आदि छह नोकपायोकी जघन्य स्थितिविभक्तिका काल नानाजीवोकी अपेक्षा कितना है ? इनका जघन्य और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है। क्योकि, यहॉपर चरम स्थितिकाण्डकसम्बन्धी उत्कीरणाकालका ग्रहण किया गया है ॥१२१. १२२॥ ओघम्मि छण्णोकसायाण जहणट्ठिदिकालो जहण्णुक्कस्मेण चुष्णिसुत्तम्मि वप्पदेवाइरियलिहिदुच्चारणाए च अतोमुहुत्तमिदि मणिदो । अम्हेहि लिहिदुच्चारणाए पुण जहण्णेण एगसमओ। उक्करण सखेजा ममया ति परूविदा, कालपहाणत्ते विवक्खिए तहोवल भादो । तेण छष्णोकसायाणमोवत्त ण विरस्टाटे । जयध अ. प. १८५.
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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