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________________ कसाय पाहुड सुन्त [ ३ स्थितिविभक्ति ८८. उक्कस्सेण उवडपोग्गलपरियड' । ८९. णाणाजीवेहि भंगविचओ । ६०. तत्थ अट्ठपदं । तं जहा । जो उकस्सिया ट्ठिदीए विहत्तिओ सो अणुक्कस्सियाए दिडीए ण होदि विहत्तिओ । ९१. जो अणुक्कस्सियाए हिदीए विहत्तिओ सो उक्कस्सियाए द्विदीए ण होदि विहत्तिओ । ९२. जस्स मोहणीयपयडी अत्थि तम्मि पदं । अकम्मे ववहारो णत्थि । ९३. एदेण अट्ठपदेण मिच्छत्तस्स सच्चे जीवा उकस्सियाए हिदीए सिया अविहत्तिया । ९४. सिया अविहत्तिया च १०६ ग्मिथ्यात्वकर्मकी जघन्य स्थितिसत्त्वको प्राप्त करके अन्तरको प्राप्त हो क्रमसे मिथ्यात्वकी प्रथमस्थितिको गलाकर, उपसमसम्यक्त्वको प्राप्त हो, अन्तर्मुहूर्त रहकर, वेदकसम्यक्त्वको प्राप्तकर पुनः अन्तर्मुहूर्त्तकालसे अनन्तानुबन्धी कषायचतुष्कका विसंयोजनकर, पुनः अधःप्रवृत्त और अपूर्वकरणको करके अनिवृत्तिकरण के कालके संख्यात भाग व्यतीत हो जाने पर मिथ्यात्वका क्षपणकर पुनः अन्तर्मुहूर्त के द्वारा सम्यग्मिथ्यात्वकी चरमफालीको पर-स्वरूपसे संक्रमण करके यथाक्रमसे अधः स्थितिगलनाके द्वारा उदयावली के निषेको के गलने पर, दो समय कालवाली एक निपेकस्थितिके अवशेष रहने पर अन्तर्मुहूर्त कालप्रमाण सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिका जघन्य अन्तरकाल प्राप्त होता है । इसी प्रकार अनन्तानुवन्धी कपायचतुष्ट्रयका भी जघन्य अन्तर जानना चाहिए | विशेषता केवल यह है कि अन्तर्मुहूर्त के भीतर दो वार अनन्ताबन्धी कषायका विसंयोजन करनेपर उनका जघन्य अन्तर प्राप्त होता है । चूर्णिसू०. (०- उक्त पांचों मोह - प्रकृतियोंकी जघन्य स्थितिविभक्तिका उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है ॥ ८८ ॥ चूर्णिसू ०. ० - अब नाना जीवोकी अपेक्षा भंग-विचय अर्थात् स्थितिविभक्तिके संभव भंगोका निर्णय किया जाता है । उसके विपयमे यह अर्थपद है । वह इस प्रकार है - जो जीव उत्कृष्ट स्थितिकी विभक्तिवाला है, वह अनुत्कृष्ट स्थितिकी विभक्तिवाला नही है । इसका कारण यह है कि उत्कृष्टस्थितिमे एक समय कम, दो समय कम आदि कालविशेपोका अभाव है । जो जीव अनुत्कृष्ट स्थितिकी विभक्तिवाला है, वह उत्कृष्टस्थितिकी विभक्तिवाला नही होता है । क्योकि, परस्परके परिहारद्वारा ही उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट स्थितियोका अवस्थान पाया जाता है । जिस जीवके माहनीयकर्म की प्रकृतियोका अस्तित्व है, उससे ही प्रकृतमें प्रयोजन है । क्योकि, कर्म-रहित जीवसे व्यवहार नहीं होता है ।। ८९-९२॥ चूर्णिस् [ ० - इस अर्थपदके द्वारा ' अव नाना जीव-सम्बन्धी भंगोका निर्णय किया जाता है - क्वचित् कदाचित् सर्व जीव मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थिति के विभक्तिवाले नही होते हैं, क्योकि, तीव्र संक्ल ेशवाले जीवोका होना प्रायः संभव नही है । कदाचित् अनेक जीव मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति नहीं करनेवाले होते है और एक जीव उत्कृष्ट विभक्ति करनेवाला होता है, क्योंकि किसी कालमे कदाचित् त्रिभुवनवर्ती अशेष जीवोके अनुत्कृष्ट स्थितिविभक्तिक होते हुए उनमे से किसी एक जीवके उत्कृष्ट स्थितिविभक्ति देखी जाती है । कड़ाचित अनेक
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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