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________________ गा० २२) स्थितिविभक्ति-स्वामित्व-निरूपण ५८. सम्मामिच्छत्तस्स जहण्णद्विदिविहत्ती कस्स ? ५९. चरिमसमयउव्वेल्लमाणस्स। ६०. अणंताणुबंधीणं जहण्णहिदिविहत्ती कस्स ? ६१. जस्स विसंजोइदे दुसमयकालट्ठिदियं सेसं तस्स । ६२. सेसं जहा उदीरणाए तहा कायव्यं । परिणत हो प्रथम पृथिवीमे उत्पन्न हुए, तथा चरमगोपुच्छाको छोड़कर शेप सर्व गोपुच्छाके गलानेवाले और एक समयकालवाली सम्यक्त्वप्रकृतिकी एक स्थितिमे वर्तमान ऐसे नारकी क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवके सम्यक्त्वप्रकृतिकी जघन्य स्थितिविभक्ति होती है। चूर्णिसू०-नारकियोमे सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिकी जघन्य स्थितिविभक्ति किसके होती है ? सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिकी उद्वेलना करनेवाले चरमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टि नारकीके सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिकी जघन्य स्थितिविभक्ति होती है ॥५८-५९॥ विशेषार्थ-जब कोई नारकी सम्यग्दृष्टि जीव मिथ्यात्वको प्राप्त होकर और उसमे अन्तर्मुहूर्त रह करके सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दोनोकी उद्वेलना प्रारम्भ कर सर्व प्रथम पल्योपमके असंख्यात भागमात्र स्थितिखंडोको यथाक्रमसे गिराकर सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना करता है और पुनः सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिके पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण स्थितिखंडोको गिरा कर अन्तिम उद्वेलनाकांडककी अन्तिमफालीको गलाता है, तब एक समय कम आवलीप्रमाण गोपुच्छाए अवशिष्ट रहती है। पुनः उन्हे भी अध:स्थितिगलनाके द्वारा गला देनेपर दो समयकालवाली एक निपेकस्थिति देखी जाती है, उसी समय सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिकी जघन्य स्थितिविभक्ति होती है । चूर्णिसू०-अनन्तानुवन्धी क्रोध, मान, माया और लोभकपायकी जघन्य स्थितिविभक्ति किसके होती है ? अनन्तानुबन्धीकपायके विसंयोजन करनेपर जिस जीवके उसकी दो समयकालप्रमाण स्थिति शेष रहती है, उसके अनन्तानुबन्धी कषायकी जघन्य स्थितिविभक्ति होती है ॥६०-६१॥ चूर्णिसू०-शेष प्रकृतियोकी जघन्य स्थितिविभक्तिका स्वामित्व-निरूपण जैसा उदीरणामें कहा है, उस प्रकारसे करना चाहिए ॥६२॥ विशेषार्थ-अप्रत्याख्यानावरणादि बारह कपाय, भय और जुगुप्सा, इन शेप प्रकृतियोमेंसे पहले मिथ्यात्वप्रकृतिकी जघन्य स्थितिका स्वामित्व कहते है-जो असंजी पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपने मिथ्यात्वके सागरोपमसहस्रप्रमाण उत्कृष्ट स्थितिवन्धमेसे पल्योपमके संख्यातवें भागमात्र स्थितिसत्त्वको घातकर अपने योग्य जघन्य स्थितिसत्त्वको करके पुनः अन्तर्मुहूर्तंकाल तक जघन्य स्थितिसत्त्ववाले मिथ्यात्वको वॉधता हुआ अवस्थित रहता है कि इतनेमे ही जीवनके समाप्त हो जानेसे मरा और दो समयवाले एक विग्रहको करके नरकगतिमे नारकियोमे उत्पन्न हुआ । वहाँ वह विग्रहगतिसम्बन्धी उन दोनो ही समयोमे असंजी पंचेन्द्रियके योग्य मिथ्यात्वकी स्थितिको वॉधता है, क्योकि, असंज्ञी पंचेन्द्रियोसे आये हुए और संजी पंचेन्द्रियपर्याप्तकोमे उत्पन्न होकर जब तक शरीरको ग्रहण नहीं किया है, तब तक उस जीवके अन्तः
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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