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________________ कसाय पाहुड सुत्त [३ स्थितिविभक्ति १९. माणसंजलणस्स जहण्णद्विदिविहत्ती मासो अंतोमुहुत्तूणो । २०. मायासंजलणस्स जहणहिदिचिहत्ती अद्धमासो अंतोमुहुत्तूणो । २१. पुरिसवेदस्स जहण्णद्विदिविहत्ती अट्ट वस्ताणि अंतोमुहत्तूणाणि। २२. छण्णोकसायाणं जहण्णहिदिविहत्ती संखेज्जाणि वस्साणि । प्रमाण क्रोधसंज्वलनकपायके चरम समयप्रबद्धकी स्थिति रहती है । यही क्रोधसंज्वलनकपायकी स्थितिविभक्तिका जघन्य काल है । चूर्णिसू०-मानसंचलनकपायकी जघन्य स्थितिविभक्तिका काल अन्तर्मुहूर्त कम । एक मास है ॥१९॥ विशेषार्थ-चारित्रमोहका क्षपण करनेवाला जीव जब मानसंज्वलनकपायकी दो कृष्टियोका क्षय करके तीसरी कृष्टिका वेदन करता है, तव उस तीसरी कृष्टिकी प्रथमस्थितिके एक समय अधिक आवलीप्रमाण शेष रहनेपर मानकपायका चरमस्थितिबंध सम्पूर्ण एक मास रहता है। इससे ऊपर एक समय कम दो आवलीमात्र काल व्यतीत होनेपर चरमसमयप्रबद्धकी स्थितिमे अन्तर्मुहूर्त कम एक मासप्रमाण कालवाले निपेक पाये जाते है । यही मानसंज्वलनकपायकी स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल है । चूर्णिसू०-मायासंज्वलनकपायकी जघन्य स्थितिविभक्तिका काल अन्तर्मुहूर्त कम अर्ध मास है ॥२०॥ विशेषार्थ-यतः मायासंज्वलनकपायके चरमस्थितिबंधके निपेक अन्तर्मुहूर्त कम अर्ध मासप्रमाण होते है, इसलिए, एक समय कम दो आवलीप्रमाण नवीन समयप्रबद्धोके गला देनेपर अन्तर्मुहूर्त कम अर्धमासमात्र निपेक-स्थितियाँ पाई जाती हैं, इस कारण यहीपर जघन्य स्थितिविभक्ति होती है। चूर्णिसू०-पुरुषवेदकी जघन्यस्थितिविभक्तिका काल अन्तर्मुहूर्त कम आठ वर्ष है।। २१॥ विशेषार्थ-इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-चरिमसमयवर्ती सवेदी क्षपकके द्वारा पुरुपवेदका वाँधा हुआ जघन्य स्थितिबंध आठ वर्पप्रमाण होता है । किन्तु निपेकस्थितियाँ अन्तमुहूर्त कम आठ वर्पप्रमाण होती है, क्योकि, अन्तर्मुहूर्तप्रमाण अवाधाकालमे निपेकोकी रचना नहीं होती है । पुनः एक समय कम दो आवली कालप्रमाण ऊपर जाकर अन्तर्मुहूर्त कम आठ वर्षप्रमाण पुरुपवेदकी निपेकस्थिति पाई जाती है। चूर्णिसू०-हास्य आदि छहो नोकपायोकी जघन्य स्थितिविभक्तिका काल संख्यात वर्ष है ॥२२॥ विशेपार्थ-तीन वेटोंमेसे किसी एक वेद ओर चारों संज्वलनकपायोमेंसे किसी एक कपायके उदयसे आपकश्रेणीपर चढ़कर और यथाक्रमसे नपुंसकवेद तथा स्त्रीवंदका क्षपणकर. तत्पश्चात् छहो नोकपायोके क्षपणकालके चरम समयमे अन्तिम स्थितिकांडककी चरमफालीक
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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