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________________ कसाय पाहुड सुत्त [ ३ स्थितिविभक्ति १५. एतो जहण्णयं । १६. मिच्छत्त सम्मामिच्छत्त-वारसकसायाणं जहण्णदिविहत्ती एगा ट्ठिदी दुसमयका लट्ठिदिया । ९४ 1 चूर्णिसू० (० - अब इससे आगे स्थितिविभक्तिके जघन्य अद्धाच्छेदको कहते है । मिध्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी आदि बारह कपायोकी स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल दो समयप्रमाण कालस्थितिवाली एक स्थिति है ॥ १५-१६ ॥ विशेषार्थ - मिध्यात्व आदि सूत्रोक्त चौदह मोहप्रकृतियोकी स्थितिविभक्तिके उपयुक्त जघन्यकाल वतलानेका कारण यह है कि असंयत सम्यग्दृष्टि गुणस्थानसे लेकर अप्रमत्तसंयत गुणस्थान तक जीव दर्शनमोहनीय कर्मकी क्षपणा के योग्य होते हैं, अतएव इन चारो गुणस्थानोसे कोई एक गुणस्थानवर्ती जीव - जिसने कि पहले ही अनन्तानुबन्धीचतुष्टयका अभाव कर दिया है - दर्शनमोहनीय कर्म की क्षपणाके लिए उद्यत हुआ तब अधःप्रवृत्तकरणके कालमे अनन्तगुणी विशुद्धिसे वृद्धिको प्राप्त हो, अप्रशस्त कर्मो के अपने पूर्ववर्ती अनुभागबंधकी अपेक्षा अनन्तगुणितहीन अनुभागबंधको बॉधकर, तथा प्रशस्तकर्मों के अपने पूर्ववर्ती अनुभागवन्धसे अनन्तगुणित अधिक अनुभागबन्धको बॉधकर भी वह स्थितिकांडकघात, अनुभागकांडकघात और गुणश्रेणीरूप कर्म-प्रदेश-निर्जरासे उन्मुक्त ही रहता है । पुनः अपूर्वकरणके काल में प्रवेशकर प्रथम समय मे ही स्थितिकांडकघात, अनुभागकांडकघात, गुणश्रेणीनिर्जरा और नही बॅधनेवाली मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन दोनो अप्रशस्त कर्मप्रकृतियां के गुणसंक्रमणको प्रारम्भ करता है । इन क्रियाविशेपोके द्वारा वह अपूर्वकरणके कालमे संख्यात हजार स्थितिकांडकोको, और स्थितिकांडकोसे संख्यातगुणित अनुभागकांडको के अपसरणोको करके तथा संख्यात हजार स्थितिबंधापसर के द्वारा उत्पन्न हुई गुणश्रेणीनिर्जरासे कर्मस्कन्धोको गलाता हुआ वह अनिवृत्तिकरणमे प्रवेश करता है | अनिवृत्तिकरणके कालमे भी हजारो स्थितिकांडकघाती और अनुभागकांडकघातोको करके और प्रतिसमय असंख्यातगुणी गुणश्रेणीके द्वारा कर्मस्कन्धोको गलाकर अनिवृत्तिकरण - कालके संख्यात भाग व्यतीत होनेपर उदयावलीसे बाहर स्थित पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण स्थितिवाली मिथ्यात्वकी चरिमफालीको लेकर सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्व, इन दोनो संक्रमाता हुआ, तथा उपरि-स्थित एक समय कम उद्यावलीप्रमाण स्थितियोको स्तियुकसंक्रमणके द्वारा संक्रमण करता है, उसके अन्तिम समय में मिथ्यात्व के एक निषेककी निषेकस्थिति दो समय कालप्रमाण पाई जाती है । इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबंधी आदि बारह कपायोके जघन्य स्थितिविभक्तिकालको जानना चाहिए । विशेष बात यह है कि उनकी अपनी अपनी चरमफालियोंको परस्वरूपसे संक्रमणकर और उदयावली - प्रविष्ट निषेकस्थितियोको स्तिवुकसंक्रमणके द्वारा संक्रामित करनेपर जब एक निषेक-स्थितिके काल में दो समय अवशिष्ट रह जाते हैं, तब उन उन प्रकृतियोकी जघन्य स्थितिविभक्ति होती है । इन सब कर्मोकी चरमफालियाँ अपने-अपने अनिवृत्तिकरणकालोके संख्यात भाग व्यतीत होनेपर पतित होती है । किन्तु, अनन्तानुबन्धी- कपायचतुष्टयकी चरमफाली अनिवृत्तिकरणकाल के
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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