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________________ कसाय पाहुड सुत्त [२ प्रकृतिविभक्ति १२७. तत्थ जो सो सादिओ सपञ्जवसिदो तस्स जहण्णेण एगसमओ । १२८: उक्कस्सेण उवड्डपोग्गलपरियट्ट । कर्मप्रकृतियोका सत्त्व बना रहे, तव अवस्थितविभक्ति कहलाती है। अवस्थितविभक्ति करनेवाले जीवोके तीन भंग होते है अनादि-अनन्त, अनादि-सान्त और आदि-सान्त । उन तीन प्रकारकी अवस्थित विभक्तियोंमेसे कितने ही जीवोमे अर्थात् अभव्य और नित्यनिगोदको प्राप्त हुए दूरान्दूर भव्योमे अनादि-अनन्तकालस्वरूप अवस्थितविभक्ति होती है, क्योकि उनमे भुजाकार और अल्पतरविभक्ति संभव ही नहीं है। कितने ही जीवोके अनादि-सान्तकालात्मक अवस्थितविभक्ति होती है । जैसे-जो जीव अनादिकालसे अभी तक छव्वीस प्रकृतियोकी सत्तारूपसे अवस्थित थे, उनके सम्यक्त्वको प्राप्त करनेपर अवस्थितविभक्तिका काल अनादि-सान्त देखा जाता है। कितने ही जीवोके अवस्थितविभक्तिका काल सादि-सान्त देखा जाता है, जिन्होने -कि पहले कभी उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त कर पुनः लगातार मिथ्यात्व-अवस्थाको धारण किया है। प्रकृतमे यह तीसरा भंग ही विवक्षित है । चूर्णिकारने इसीके जघन्य और उत्कृष्ट कालका आगे वर्णन किया है । चूर्णिसू०-इनमे जो सादि-सान्त अवस्थितविभक्ति है, उसका जघन्य काल एक समय है ॥ १२७॥ विशेषार्थ-अन्तरकरणको करके मिथ्यात्वप्रकृतिकी प्रथम स्थितिके द्विचरम समयमे सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना करके अट्ठाईस प्रकृतियोकी विभक्तिसे सत्ताईस प्रकृतियोकी विभक्तिको प्राप्त होनेपर एक समय अल्पतरविभक्तिको करके तत्पश्चात् मिथ्यादृष्टि गुणस्थानके चरम समयमें सत्ताईस प्रकृतियोकी विभक्तिरूपसे एक समयमात्र अवस्थित रह कर, तदनन्तर समयमे ही सम्यक्त्वको प्राप्त होनेवाले जीवके अल्पतर और भुजाकार विभक्तिके मध्यमे सादि-सान्त अवस्थितविभक्तिका एक समय-प्रमाण जघन्य काल पाया जाता है। कहनेका अभिप्राय यह है कि अवस्थितविभक्तिका जघन्य काल एक समय बतलानेके लिए मिथ्यात्व गुणस्थानके अन्तिम दो समय और उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करनेका प्रथम समय, इस प्रकार इन तीन समयोको ग्रहण करे । इनमेसे प्रथम समयमे सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना कर सत्ताईस प्रकृतियोकी विभक्तिको प्राप्त होकर अल्पतरविभक्ति करता है। दूसरे समयमे अवस्थितविभक्ति करता है और तीसरे समयमे उपशमसम्यक्त्वको ग्रहण कर अट्ठाईस प्रकृतियोकी विभक्तिको प्राप्त होकर भुजाकारविभक्ति करता है। इस प्रकार अल्पतर और भुजाकार विभक्तिके मध्यमे अवस्थितविभक्तिका जघन्य काल एक समय प्राप्त होता है। इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलनाकी अपेक्षा भी अवस्थित विभक्तिका जघन्यकाल एक समय प्राप्त होता है। चूर्णिसू०-सादि-सान्त अवस्थितविभक्तिका उत्कृष्ट काल उपार्ध पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है ॥१२८॥ - विशेपार्थ-किसी एक अनादिमिथ्यादृष्टि जीवने तीनो करणोको करके प्रथमोशम
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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