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________________ गा० २२] भुजाकारविभक्ति-काल-ग्ररूपण ___ १२२. एत्थ एगजीवेण कालो । १२३. भुजगारसंतकम्मविहत्तिओ केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णुक्कस्सेण एगसमओ । १२४. अप्पदरसंतकम्मविहत्तिओ केवचिरं कालादो होदि ? जहण्णेण एगसमओ । १२५. उक्कस्सेण वे समया । १२६. अवविदसंतकम्मविहत्तियाणं तिण्णि भंगा। चूर्णिसू०-उनमेसे यहॉपर एक जीवकी अपेक्षा काल कहते है । भुजाकारस्वरूप सत्त्वप्रकृतियोकी विभक्तिका कितना काल है ? जघन्य और उत्कृष्ट काल एक समय है ॥१२२-१२३॥ विशेषार्थ-अल्प कर्म-प्रकृतियोकी सत्तासे बहुत कर्मप्रकृतियोकी सत्ताको प्राप्त होना भुजाकारविभक्ति कहलाती है। इस प्रकारकी भुजाकारविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्ट काल छब्बीस या सत्ताईस प्रकृतियोंकी विभक्ति करनेवाले जीवके उपशमसम्यक्त्वको ग्रहण कर अट्ठाईस प्रकृतियोका सत्त्व स्थापित करने पर एक समयप्रमाण पाया जाता है । इसी प्रकारसे चौवीस प्रकृतियोकी सत्तावाले सम्यग्दृष्टि जीवके मिथ्यात्वको प्राप्त हो अट्ठाईस प्रकृतियोके सत्त्वको स्थापित करने पर भी भुजाकारविभक्तिका काल एक समयप्रमाण देखा जाता है । चूर्णिसू०-अल्पतरस्वरूप सत्त्वप्रकृतियोकी विभक्तिका कितना काल है ? जघन्य काल एक समय है ॥१२४॥ विशेषार्थ-बहुत कर्म-प्रकृतियोकी सत्तासे अल्प कर्म-प्रकृतियोकी सत्ताको प्राप्त होना अल्पतरविभक्ति कहलाती है। अट्ठाईस सत्त्वप्रकृतियोकी विभक्तिवाले जीवके अनन्तानुबन्धीचतुष्कके विसंयोजन कर चौबीस प्रकृतियोका सत्त्व स्थापित करने पर अल्पतरविभक्तिका काल एक समयप्रमाण पाया जाता है । इसी प्रकार सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतियोका उद्वेलन कर चुकने पर प्रथम समयमे, मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति के क्षपण कर चुकने पर प्रथम समयमे, तथा क्षपकश्रेणीमे क्षपणयोग्य प्रकृतियोके क्षपण कर चुकने पर प्रथम समयमे भी अल्पतरविभक्तिका जघन्य काल एक समय पाया जाता है। चूर्णिसू०-अल्पतरविभक्तिका उत्कृष्टकाल दो समय है ॥१२५॥ विशेषार्थ-नपुंसकवेदके उदयके साथ क्षपकश्रेणीपर चढ़े हुए जीवके सवेद भागके द्विचरम समयमे स्त्रीवेदके पर-प्रकृति रूपसे संक्रमण होकर तेरह प्रकृतियोकी सत्तासे वारह प्रकृतियोकी सत्ताको प्राप्त होनेपर, और तदनन्तर समयमे नपुंसकवेदकी उदयस्थितिको गलाकर बारह प्रकृतियोकी सत्तासे ग्यारह प्रकृतियोकी सत्ताको प्राप्त होनेपर लगातार अल्पतरविभक्तिका उत्कृष्ट काल दो समयप्रमाण पाया जाता है। चूर्णिसू०-अवस्थित कर्म-प्रकृतियोकी सत्त्व-विभक्तिवाले जीवोंके कालके तीन भंग होते है ॥१२६॥ विशेषार्थ-जब मुजाकार और अल्पतर विभक्ति न हो, किन्तु एक सदृश ही १ त जहा केसि पि अणादिओ अपनवसिदो । केसि पि अणादिओ मपजवसिदो। केमि पि सादिओ सपजवसिदो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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