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________________ कसाय पाहुड सुत्त [२ प्रकृतिविभक्ति ८६. उक्कस्सेण उवड्डपोग्गलपरियट्ट* । ८७. सत्तावीसविहत्ती केवचिरं कालादो ? जहण्णेण एगसमओ। हैं, तथा जो द्वितीय स्थितिमे स्थित सम्यग्मिथ्यात्वकी चरम फालिको सर्वसंक्रमणके द्वारा मिथ्यात्वके ऊपर प्रक्षिप्त कर मिथ्यात्वकी प्रथम स्थिति-सम्बन्धी अन्तिम गोपुच्छाका वेदन कर रहा है वह मिथ्यादृष्टि जीव एक समयमात्र छब्बीस प्रकृतिको विभक्तिताको प्राप्त करके उसके उपरिम समयमें सम्यक्त्वको प्राप्त होकर अट्ठाईस प्रकृतिकी सत्तावाला हो जाता है, तब उसके छब्बीस प्रकृतियोंकी विभक्तिका एक समयप्रमाण जघन्यकाल पाया जाता है। चूर्णिसू०-छव्वीस प्रकृतियोकी विभक्तिका उत्कृष्ट काल देशोन अर्धपुद्गलपरिवर्तन है ।। ८६।। विशेषार्थ-कोई अनादि मिथ्यादृष्टि जीव तीनो ही करणोको करके उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त हुआ और इस प्रकार उसने अनन्त संसारको छेदकर संसारमे रहनेके कालको अर्धपुदलपरिवर्तनप्रमाण किया । पुनः उपशमसम्यक्त्वका काल समाप्त होनेपर मिथ्यात्वको प्राप्त हो, सबसे जघन्य पल्योपमके असंख्यातवे भागमात्र उद्वेलनाकालके द्वारा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन दोनो प्रकृतियोकी उद्वेलनाकर छब्बीस विभक्तिका प्रारम्भ किया। तत्पश्चात् कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनकाल तक संसारमे परिभ्रमण कर जव अर्धपुद्गलपरिवर्तनमे सर्वजघन्य अन्तर्मुहूर्तकाल शेप रहा, तव उपशमसम्यक्त्वको ग्रहण किया, और अट्ठाईस प्रकृतिकी विभक्तिको प्राप्त हो, अन्तर्मुहूर्तकालमे ही आपकश्रेण्यारोहण, केवलज्ञानोत्पत्ति और समुद्धात आदि करता हुआ निर्वाणको प्राप्त हुआ । इस प्रकारसे छब्बीस प्रकृतियोकी विभक्तिका देशोन पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण उत्कृष्टकाल पाया जाता है। यहॉपर देशोनका अर्थ अर्धपुद्गलपरिवर्तनके कालमें सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतिके पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण उद्वेलनाकालको कम करना है। __ चूर्णिसू ०-सत्ताईस प्रकृतियोंकी विभक्तिका कितना काल है ? जघन्यकाल एक समय है ।।८७॥ विगेपार्थ-मोहकर्मकी अट्ठाईस प्रकृतिकी सत्तावाले मिथ्यादृष्टि जीवने सम्यक्त्वप्रकृतिके उद्वेलनाकालमे अन्तर्मुहूर्तकाल अवशेष रहनेपर तीनो करणोको करके और अन्तरकरण कर मिथ्यात्वकी प्रथमस्थितिके द्विचरम समयमे सम्यक्त्वप्रकृतिकी चरमफालीको सर्वसंक्रमणके द्वारा मिथ्यात्वमे प्रक्षेप किया, तव प्रथमस्थितिके चरमसमयमे सत्ताईस प्रकृतियोकी विभक्ति प्रारंभ होती है। तदनन्तर द्वितीय समयमे उपशमसम्यक्त्वको ग्रहणकर यतः यह अहाइस तकृतियोकी विभक्ति करनेवाला हो जाता है, अतः सत्ताईस प्रकृतियाकी विभक्तिका जवन्यकाल एक समयप्रमाण कहा गया है । * ऊणमद्धपोग्गलपरियट्ट उपोग्गलपरियमिदि णयारलोव काऊण णिदित्तादो । ऊणस्स अद्धपोग्गलपरियदृस्स उवट्टपोग्गलपरियमिदि सण्णा । अथवा उपगन्टस्य हीनार्थवाचिनो ग्रहणात् । जयध°
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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