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________________ ___ गा० २२] प्रकृतिस्थानविभक्ति-काल-निरूपण ७७. एकावीसाए विहत्ती केवचिरं कालादो ? जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । ७८ उक्कस्सेण तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि । कोई जीव नपुंसकवेदके उदयके साथ क्षपकश्रेणी पर चढ़ा और अप्रत्याख्यानावरणादि आठ मध्यमकषायोका क्षयकर तेरह प्रकृतियोकी विभक्ति करनेवाला हुआ। तत्पश्चात् नपुंसकवेदकी क्षपणाके आरम्भकालमे ही नपुंसकवेदका क्ष्य करता हुआ नपुंसकवेदको अपने क्षपणकालमे क्षय न करके स्त्रीवेदका क्षपण प्रारम्भ कर देता है । पुनः स्त्रीवेदके साथ नपुंसकवेदका क्ष्य करता हुआ तबतक जाता है जबतक कि स्त्रीवेदके पुरातन निषेकोके क्षपणकालका त्रिचरिमसमय प्राप्त होता है । पुनः सवेदकालके द्विचरमसमयमे नपुंसकवेदकी प्रथम स्थितिके दो समयमात्र शेप रहनेपर स्त्रीवेद और नपुंसकवेदके सत्तामे स्थित समस्त निपेकोको पुरुपवेदमे संक्रमित हो जानेपर तदनन्तर समयमे बारह प्रकृतियोकी विभक्ति करनेवाला होता है, क्योकि अभी नपुंसकवेदकी उदयस्थितिका विनाश नहीं हुआ है। इसके पश्चात् द्वितीय समयमे ही ग्यारह प्रकृतियोकी विभक्ति प्रारम्भ हो जाती है, क्योकि, उस समय पूर्वली स्थितिके निषेक फल देकर अकर्मस्वरूपसे परिणत हो जाते है । इस प्रकार बारह प्रकृतिरूप सत्त्वस्थानकी विभक्तिका जघन्यकाल एक समय सिद्ध हो जाता है। चूर्णिसू०-इक्कीस प्रकृतियोकी विभक्तिका कितना काल है ? जघन्यकाल अन्तमुहूर्त है ॥७७॥ विशेषार्थ-इक्कीस प्रकृतिकी विभक्तिका जघन्यकाल इस प्रकार संभव है-मोहकर्मकी चौबीस प्रकृतियोकी सत्तावाले किसी मनुष्यने तीनो करणोको करके दर्शनमोहनीयकी तीनो प्रकृतियोका क्षय किया और इक्कीस प्रकृतियोका सत्त्वस्थान पाया। पुनः सर्वलघु अन्तर्मुहर्तकालमे ही क्षपकश्रेणीपर चढ़कर आठ मध्यमकषायोका क्षय कर दिया। इस प्रकार इक्कीस प्रकृतियोकी विभक्तिका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त सिद्ध हो जाता है। चूर्णिसू०-इक्कीस प्रकृतियोकी विभक्तिका उत्कृष्टकाल साधिक तेतीस सागरोपम है ॥७८॥ विशेषार्थ-उक्त काल इस प्रकार संभव है-मोहकर्मकी चौबीस प्रकृतियोकी सत्तावाला कोई देव अथवा नारकी सम्यग्दृष्टि जीव पूर्वकोटिवर्पकी आयुवाले मनुष्योमें उत्पन्न हुआ । वहाँ गर्भसे लेकर आठ वर्षके पश्चात् दर्शनमोहनीयका क्षयकर इक्कीस प्रकृतिवाले सत्त्वस्थानकी विभक्तिका प्रारम्भ किया । पुनः दीक्षित होकर आठ वर्प कम पूर्वकोटिवर्पप्रमाण संयम पालन कर मरा और तेतीस सागरोपमकी आयुवाले अनुत्तरविमानवासी देवोमे उत्पन्न हुआ । वहॉपर तेतीस सागरकाल विताकर आयुके अन्तमे मरा और पूर्वकोटिवर्पकी आयुवाले मनुष्योमे उत्पन्न हुआ। वहॉपर जब अन्तर्मुहूर्तप्रमाण आयुकर्म या संसार अवशिष्ट रहा तब अप्रत्याख्यानावरणादि आठ कपायोका क्षयकर तेरह प्रकृतियोंकी विभक्ति करनेवाला हुआ। इस प्रकार आठवर्प और अन्तर्मुहर्त कम दो पूर्वकोटिवाने अधिक तेतीस मागरोपम इक्कीस
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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