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________________ गा० २२ ] प्रकृतिस्थानविभक्ति-काल-निरूपण ८३. पश्चात् स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, नरकगति, तिर्यग्गति,नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, और चतुरिन्द्रियजाति; आताप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म, साधारणशरीर, इन सोलह प्रकृतियोंका क्षय करता है । यद्यपि ये प्रकृतियाँ मोहकर्मकी नही है, किन्तु स्त्यानगृद्धि आदि तीन दर्शनावरणकी और शेप तेरह नामकर्मकी हैं । तो भी इनका क्षय इसी स्थलपर होता है । इनका क्षय करनेपर भी मोहकर्मके तेरह प्रकृतियोंकी विभक्तिका ही स्वामी है । इसके पश्चात् एक अन्तर्मुहूर्त जाकर मनःपर्ययज्ञानावरणीय और दानान्तराय इन दोनो प्रकृतियोके सर्वधाति बंधको देशवातिरूप करता है । इसके अन्तर्मुहर्त पश्चात् अवधिज्ञानावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय और लाभान्तराय, इन तीन प्रकृतियोके सर्वघातिबंधको देशघातिरूप करता है। इसके अन्तर्मुहूर्त पश्चात् श्रुतज्ञानावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय और भोगान्तराय, इन तीन प्रकृतियोके सर्वघातिवंधको देशधातिरूप करता है । इसके अन्तमुहूर्त पश्चात् चक्षुदर्शनावरणीयकर्मके सर्वघातिबंधको देशघातिरूप करता है । इसके अन्तमुहूर्त पश्चात् मतिज्ञानावरणीय और परिभोगान्तराय, इन दो प्रकृतियोके सर्ववातिबंधको देशघातरूप करता है। इसके अन्तर्मुहूर्त पश्चात् वीर्यान्तरायकर्मके सर्वघातिबंधको देशघातिरूप करता है । इसके अन्तर्मुहूर्त पश्चात् चार संज्वलनकपाय और नव नोकपाय, इन तेरह चारित्रमोहप्रकृतियोका अन्तरकरण करता है । इसी समय आगे क्षपणाधिकारमे वतलाए जाने वाले सात आवश्यक करणोका एक साथ प्रारम्भ करता है। अन्तरकरणके द्वितीय समयसे लेकर एक अन्तर्मुहूर्त तक नपुंसकवेदका क्षय करता है और वारह प्रकृतिरूप सत्त्वस्थानविभक्तिका स्वामी होता है । इसके पश्चात् ही द्वितीय समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त तक स्त्रीवेदका क्षय करता है, और ग्यारह प्रकृतिरूप सत्त्वस्थान-विभक्तिका स्वामी होता है। तत्पश्चात् हास्य, रति, अरति, शोक, भय और जुगुप्सा इन छह नोकषायांका क्षय करनेके लिए सर्वसंक्रमणके द्वारा उन्हे क्रोधसंज्वलनमे संक्रमाता है। इस क्रियामे भी एक अन्तर्मुहूर्तकाल व्यतीत होता है और इसी समय वह पांच प्रकृतिरूप सत्त्वस्थानविभक्तिका स्वामी होता है। तत्पश्चात् एक समय कम दो आवलीकालमे अश्वकर्णकरण करता हुआ पुरुषवेदका क्षय करता है और तभी वह चार प्रकृतिरूप सत्त्वस्थानविभक्तिका स्वामी होता है। तत्पश्चात् एक अन्तर्मुहूर्तसे अश्वकर्णकरणको समाप्त कर चारो संज्वलनकपायोंमेसे एक एक कपायकी तीन तीन बादरकृष्टियाँ अन्तर्मुहूर्तकालसे करता है। पुनः कृष्टिकरणके पश्चात् क्रोधसंज्वलनकी तीनो कृष्टियां क्रमशः अन्तर्मुहूर्तकालसे क्षय करता है और तीन प्रकृतिरूप सत्त्वस्थानविभक्तिका स्वामी होता है । तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्तकाल-द्वारा क्रमशः मानसंज्वलनकी तीनो कृष्टियोका क्षय करता है और दो प्रकृतिरूप सत्त्वस्थानविभक्तिका स्वामी होता है। पुनः अन्तर्मुहूर्तकाल-द्वारा मायासंज्वलनकी तीनो कृष्टियोका क्षय करता हुआ लोभसंज्वलनकी प्रथम कृष्टिके भीतर दो समय कम दो आवलीप्रमाणकाल जाकर उनका क्षय करता है और एक प्रकृतिरूप सत्त्वस्थानविभक्तिका स्वामी होता है। तत्पश्चात् यथाक्रमसे दो समय
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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