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________________ कलाय पाहुड सुत्त [२ प्रकृतिविभक्ति है, उसे एक प्रकृतिविभक्तिकाल कहते हैं। इस एक प्रकृतिकी विभक्ति तथा आगे कही जानेवाली दो, तीन, चार, पांच, ग्यारह, बारह और तेरह प्रकृतियोकी विभक्ति क्षपकश्रेणीमे ही होती है । क्षपकश्रेणीका उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण ही है, अतएव इन सब विभक्तियोंका भी उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण ही सिद्ध होता है । तथापि उनके कालमें जो अपेक्षाकृत भेद है, उसका जान लेना आवश्यक है, तभी उन विभक्तियोका आगे कहे जानेवाला जघन्य और उत्कृष्ट काल समझमें आसकेगा। अतएव यहॉपर आपकश्रेणीका कुछ वर्णन किया जाता है । मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति तथा अनन्तानुबन्धीकषायचतुष्क इन सात मोहनीय-प्रकृतियोकी सत्तासे रहित, अथवा अवशिष्ट इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाला नायिकसम्यग्दृष्टि जीव ही चारित्रमोहकी क्षपणाके लिए उद्यत होता है, इसका कारण यह है कि शुद्ध (निर्मल) दृढ़ श्रद्धानके विना चारित्रमोहका क्षय नहीं किया जा सकता है। अतएव क्षायिकसम्यग्दृष्टि संयत क्षपकश्रेणीपर चढ़नेके पूर्व अधःकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण नामसे प्रसिद्ध तीन करणोको करता है। इन तीनो करणोका पृथक्-पृथक् और समुदित काल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण ही है। अधःप्रवृत्तकरणकालके समाप्त होने तक वह सातिशय अप्रमत्तसंयतकी अवस्थामें रहता है और प्रतिसमय अधिकाधिक विशुद्धि एवं आनन्द-उल्लाससे परिपूरित होता रहता है। अधःप्रवृत्तकरणका काल समाप्त होते ही वह अपूर्वकरण परिणामोको धारण कर आठवे गुणस्थानको प्राप्त होता है । इस गुणस्थानमे प्रतिसमय अनन्तगुणी विशुद्धिसे विशुद्ध होता हुआ उन अपूर्व परिणामोंको प्राप्त करता है, जिन्हें कि इस समयके पूर्व कभी नहीं पाया था। उक्त दोनो परिणामोंके कालमे मोह-क्षयके लिए समुद्यत होता हुआ भी यह जीव किसी भी मोहप्रकृतिका क्षय नहीं करता है, किन्तु उनके क्षय करनेके योग्य अपने आपको तैयार करता है। अतएव इसकी उपमा उस सुभटसे दी जा सकती है, जिसने अभी किसी शत्रुका घात नहीं किया है, किन्तु शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित एवं वीर-रससे परिपूरित हो रणाङ्गणमे प्रवेश किया है । शस्त्रास्त्रोसे सुसज्जित होते समय भी वीर-रस प्रवाहित होने लगता है, किन्तु रणाङ्गणमें प्रवेश करनेका वीर-रस अपूर्व ही होता है । शस्त्रास्त्रोसे सुसज्जित होनेके समान अधःप्रवृत्तकरणको करनेवाला सातिशय-अप्रमत्तसंयत गुणस्थान है और वीर-रससे ओत-प्रोत हो रणानणमें प्रवेश करनेके समान अपूर्वकरण गुणस्थान है । अपूर्वकरणका काल समाप्त होते ही अनिवृत्तिकरण परिणामोको धारण करता हुआ नवे अनिवृत्तिकरण गुणस्थानको प्राप्त होता है और एक साथ स्थितिखंडन, अनुभागखंडन आदि आवश्यकोको करना प्रारम्भ कर देता है। जिस प्रकार रण-प्रारम्भ होनेकी प्रतिक्षण प्रतीक्षा करनेवाला सुभट रण-भेरी वजनेके साथ ही शत्रु-सैन्यपर धावा बोलकर मार-काट प्रारंभ कर देता है। इस अनिवृत्तिकरणगुणस्थानसम्बन्धी कालके संख्यात भाग जानेपर सर्वप्रथम अप्रत्याख्यानावरणचतुष्क और प्रत्याख्यानावरणचतुष्क इन आठ कपायोका भय करता है और तेरह प्रकृतिरूप सत्त्वस्थानविभक्तिका स्वामी होता है । पुनः अन्तर्मुहूर्तके
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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