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________________ कसाय पाहुड सुप्त [ २ प्रकृतिविभक्ति जीव सर्वकाल पाये जाते है । आदेशकी अपेक्षा भी कालका निर्णय ओधके ही समान है । केवल कुछ पदोंमे खास विशेषता है, जैसे- आहारककाययोगी जीवोके अट्ठाईस प्रकृतियोकी विभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तमुहूर्त है । आहारक मिश्रयोगी जीवोके अट्ठाईस प्रकृतियोकी विभक्तिका जघन्य और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है । उपशमसम्यग्दृष्टि के अट्ठाईस प्रकृतियोकी विभक्तिका जघन्यकाल अन्तमुहूर्त और उत्कृष्टकाल पल्यो - पमका असंख्यातवाँ भाग है । इस प्रकार अन्यपदोके कालसम्बन्धी विशेषताको भी जान लेना चाहिए । ( ९ ) पहले एक जीवकी अपेक्षा अन्तरका निर्णय किया गया है, अब नानाजीवोकी अपेक्षा अन्तरका निर्णय करते है । ओघसे अट्ठाईस प्रकृतियोकी विभक्तिका अन्तर नहीं है, क्योकि नानाजीवोकी अपेक्षा सर्वकाल विभक्ति करनेवाले जीव पाये जाते हैं । इसी प्रकार आदेशकी अपेक्षा भी अन्तर जानना चाहिए । केवल कुछ पढ़ो के अन्तरकालोमे विशेषता है, जैसे - लव्ध्यपर्याप्त मनुष्यके अट्ठाईस प्रकृतियोकी विभक्तिका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल पल्योपमका असंख्यातवा भाग है । वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवो के छब्बीस प्रकृतियोकी विभक्तिका अन्तर जघन्य एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर वारह मुहूर्त है, इत्यादि । (१०) मोहकी विवक्षित प्रकृतिकी विभक्ति करनेवाला जीव अन्य अविवक्षित प्रकृतियोंकी विभक्ति करनेवाला है, अथवा अविभक्ति करनेवाला १ इस प्रकारके विचार करनेवाले अनुयोगद्वारको सन्निकर्प अनुयोगद्वार कहते है । ओघसे जो जीव मिथ्यात्व - की विभक्ति करनेवाला है, वह सम्यक्त्वप्रकृति, सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबंधी कषायचतुष्ककी कदाचित् विभक्ति करनेवाला भी होता है और कदाचित् अविभक्ति करनेवाला भी होता है, किन्तु इनके अतिरिक्त शेप प्रकृतियोकी नियमसे विभक्ति करनेवाला होता है । सम्यक्त्वप्रकृतिकी विभक्ति करनेवाला जीव मिथ्यात्व सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबंधी - चतुष्ककी कदाचित् विभक्ति करनेवाला भी होता है और कदाचित अविभक्ति करनेवाला भी होता है । किन्तु इनके अतिरिक्त शेप प्रकृतियोकी नियमसे विभक्ति करनेवाला होता है । इसी प्रकार ओघसे अवशिष्ट प्रकृतियोका तथा आदेश से सर्वपदो में समस्त प्रकृतियोका यथासंभव सन्निकर्षं करना चाहिए । (११) मोहकर्मकी किस प्रकृतिकी विभक्ति करनेवाले जीव किस प्रकृतिकी विभक्ति करनेवाले जीवोसे अल्प होते हैं या अधिक ? इस प्रकारके निर्णय करने - वाले द्वारको अल्पबहुत्व अनुयोगद्वार कहते हैं । ओघकी अपेक्षा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व - के विना शेष छत्रीस प्रकृतियोकी अविभक्ति करनेवाले जीव सबसे कम है । उन्हीकी विभक्ति करनेवाले जीव अनन्तगुणित है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी विभक्ति करनेवाले जीव सबसे कम है । उन्हीकी अविभक्ति करनेवाले जीव अनन्तगुणित है । आदेशकी अपेक्षा नरकगतिमे सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन दो प्रकृतियोकी विभक्ति करनेवाले जीव सबसे कम है । इन्हीकी अविभक्ति करनेवाले जीव उनसे असंख्यातगुणित है । इस प्रकारसे सभी मार्गणाओंमें अल्पबहुत्वका निर्णय यथासंभव जीवराशिके अनुसार कर लेना ५६
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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