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________________ * कसाय पाहुड सुत्त [ १ पेज्जदोसविहत्ती इसी प्रकार से शेष मार्गणाओंका यथासंभव काल जान लेना चाहिए । (१०) नानाजीवोकी अपेक्षा अन्तरानुगमका भी निर्देश दो प्रकारका है । ओघनिर्देशकी अपेक्षा रागी द्वेपी जीवोंका अन्तर नहीं है, क्योकि, सदैव रागी द्वेषी जीवोंका अस्तित्व पाया जाता है । इसी प्रकार सान्तरमार्गणाओको छोड़कर शेष मार्गणाओका भी अन्तर नहीं है । सान्तरमार्गणाओ में लब्ध्यपर्याप्त मनुष्योका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्योपमका असंख्यातवा भाग है वैक्रियिकमिश्रका जघन्य एक समय, उत्कृष्ट बारह मुहूर्त, आहारकमिश्रका जघन्य एक समय, उत्कृष्ट वर्षपृथक्त्व, अपगतवेदी तथा सूक्ष्मसाम्परायिक जीवों का जघन्य एक समय और उत्कृष्ट छह मास तथा उपशमसम्यक्त्वी जीवोंका जघन्य एक समय और उत्कृष्ट चौवीस अहोरात्रप्रमाण अन्तर जानना चाहिए । (११) रागभावके धारक जीव सर्व जीवोके कितने भाग है और द्वेषभावके धारक जीव सर्वजीवोके कितने भाग हैं । इस प्रकारके विभाग के निर्णय करनेवाले अनुयोगद्वारको भागाभागानुगम कहते है । इस अनुयोगद्वारका भी ओघ और आदेशकी अपेक्षा दो प्रकारका निर्देश है । उनमेसे ओधनिर्देशकी अपेक्षा रागभावके धारक जीव सर्वजीवोकी संख्याके ( जिनमे कि वीतराग सिद्ध सम्मिलित नहीं है ) साधिकद्विभाग है अर्थात् यदि रागी द्वेषी जीवोकी संख्याके समान चार भाग किये जावे तो उनमेसे दो भाग तो पूरे और कुछ अधिक जीव हैं । तथा द्वेषभावके धारक जीव दो भागो मेसे कुछ कम संख्याप्रमाण हैं । इसका कारण यह है कि द्वेषभावके धारक जीवोकी अपेक्षा रागभावके धारक जीव कुछ अधिक हैं, 1 क्योकि, समस्त देवराशिके लोभकषाय अधिक मात्रा पाई जाती है । इसी प्रकार मार्ग - णाओमें भी भागाभागको जान लेना चाहिए । (१२) रागी द्वेषी जीवोंके हीनाधिकता के प्रतिपादन करनेवाले अनुयोगद्वारको अल्पबहुत्वानुगम कहते है । इसका भी दो प्रकारका निर्देश है - ओघनिर्देश और आदेश निर्देश | ओघनिर्देशकी अपेक्षा द्वेषभाव के धारक जीव अल्प है और रागभावके धारक जीव उनसे विशेष अधिक है । आदेशकी अपेक्षा नरकगतिमें रागभावके धारक जीव कम हैं और द्वेषभावके धारक जीव उनसे संख्यातगुणित अधिक । | देवगति द्वेषभावके धारक जीव अल्प है और रागभावके धारक जीव संख्यातगुणित है । तिर्यंच और मनुष्योमे द्वेषभावके धारक जीव अल्प है । इसी क्रमसे यथासंभव शेप मार्गणाओमे भी रागी द्वेषी जीवोका अल्पवहुत्व जान लेना चाहिए | इस प्रकार योद्वेषविभत्ति समाप्त हुई । ઘર whanks
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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