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भाषाकारका मंगलाचरण
सकल कर्म रज दूर कर, सर्व पूज्य पद पाय । सिद्धि-योग्य अरहंतको, वंदू शीस नवाय ॥१॥
अष्टकर्मको नष्ट कर पा अष्टम क्षितिराज ।
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अक्षय अगणित गुण-धनी, जयवंतो शिवराज ||२||
जो शिव - मग पर नित्य ही चलें चलावें श्राप | ये गणधर आचार्य मम, हरें सकल संताप || ३ || उपदेशें शिवमार्गको, पाठक बन सुखदाय । ध्यान धरें निजरूपका, यशोमूर्ति उवाय ||४|| साधें श्रतम रूपको, धुनें पाप दुखदाय । वे असहाय सहाय कर, मेरी करहिं सहाय ॥ ५॥ वीरवदन-निर्गत-अमल-ज्ञान-सलिल-मय-धार । वहा वहा जगदम्ब ! तू, करे जगत उपकार || ६ || नय-कर- रवि, श्रुत-धर तथा, विनिहत मदन प्रसार । श्रीगुणधरको वन्दना, करता वारंवार ||७|| बहु-नय- गर्भित, गहन प्रति, अमित अर्थ- संयुक्त । जिन कसायपाहुड रचा, अनुपम गाथा युक्त ||८|| यतियोंमें वर वृषभ हैं, श्री यतिवृषभ महन्त । चूर्णिसूत्र के रचयिता, वन्दु सदा नमन्त ॥ ॥