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________________ ९०१ सू० ८] केवलिसमुद्धात-निरूपण ४. तम्हि द्विदीए असंखेज्जे भागे हणइ । ५. सेसस्स च अणुभागस्स अप्पसत्थाणमणंता भागे हणदि । ६. तदो विदियसमए कवाडं करेदि । ७. तम्हि सेसिगाए द्विदीए असंखेज्जे भागे हणइ । ८. सेसस्स च अणुभागस्स अप्पसत्थाणमणंते भागे हणइ । अघातिया कर्मोंकी हीनाधिक स्थितिके समीकरणके लिए जो समुद्धात करते हैं अर्थात् अपने आत्मप्रदेशोंको ऊपर, नीचे और तिर्यक् रूपसे विस्तृत करते हैं, उसे केवलिसमुद्धात कहते है। इस समुद्धातकी दंड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण-रूप चार अवस्थाएँ होती हैं । इनका वर्णन आगे चूर्णिकार स्वयं कर रहे हैं । चर्णिसू०-सयोगिकेवली जिन प्रथम समयमें दंडसमुद्घात करते हैं। उसमें कर्मोंकी स्थितिके असंख्यात बहुभागोका घात करते हैं । कोंके अवशिष्ट अनुभागके अप्रशस्त अनुभागसम्बन्धी अनन्त बहुभागोंका घात करते हैं ॥३-५॥ विशेषार्थ-सयोगिकेवली जिन पद्मासन या खगासन दोनो ही आसनोसे पूर्वाभिमुख या उत्तरदिशाभिमुख होकरके समुद्धात करते हैं। इनमेसे केवलीके खड्गासनसे इंडसमुद्धात करनेपर आत्मप्रदेश मूलशरीर-प्रमाण विस्तृत और वातवलयसे कम चौदह राजुप्रमाण आयत दंडके आकाररूप फैलते हैं, इसलिए इसे दंडसमुद्बात कहते हैं । यदि सयोगी जिन पद्मासनसे समुद्धात करते हैं, तो दंडाकार प्रदेशोका बाहुल्य मूलशरीरके वाहुल्यसे तिगुना रहता है । दंडसमुद्धातमें पूर्व या उत्तर दिशाकी ओर मुख करनेकी अपेक्षा कोई अन्तर नहीं पड़ता है। हॉ, आगेके समुद्धातोमें अवश्य भेद होता है, सो वह आगे बताया जायगा। इस दंडसमुद्धातमें अघातिया कोंकी जो पल्योपमके असंख्यातवें भाग स्थिति थी, उसके बहुभागोका घात करता है । तथा बारहवें गुणस्थानके अन्तमे घात करनेसे जो अनुभाग बचा था, उसमेंसे अप्रशस्त अनुभागके भी बहुभागका घात करता है। इस प्रकार इतने कार्य दंडसमुद्धातमें होते हैं । इस समुद्धातमे औदारिककाययोग ही होता है। चूर्णिसू०-तदनन्तर द्वितीय समयमें कपाटसमुद्धात करते हैं । उसमें अघातिया कर्मोंकी शेष स्थितिके भी असंख्यात बहुभागोका घात करते हैं और अवशिष्ट अनुभागसम्बन्धी अप्रशस्त अनुभागके अनन्त बहुभागोका घात करते है ॥६-८॥ विशेषार्थ-जिस प्रकार कपाट (किवाड़ ) बाहुल्यकी अपेक्षा अल्प परिमाण ही रहता है, परन्तु विष्कम्भ और आयामकी अपेक्षा विस्तृत होता है, इसी प्रकार कपाटसमुद्धातमे केवली जिनके आत्मप्रदेश वातवलयसे कम चौदह राजु लम्बे और सात राजु चौड़े हो जाते हैं । बाहुल्य खड्गासन केवलीके मूल शरीरप्रमाण और पद्मासनके उससे तिगुना जानना चाहिए । इस समुद्धातमे पूर्व या उत्तरदिशाकी ओर मुख करनेसे विस्तारमें अन्तर पड़ जाता है । अर्थात् जिनका मुख पूर्वकी ओर होता है, उनका विस्तार उत्तर और दक्षिण दिशामें सात राजु रहता है। किन्तु जिनका मुख समुद्धात करते समय उत्तर दिशाकी ओर रहता है, उनका विस्तार पूर्व और पश्चिम दिशामे लोकके विस्तारके समान हीनाधिक रहता है। इस समुद्धातमे केवली भगवान्के औदारिकमिश्रकाययोग होता है।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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