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________________ जीवाभिगमसूत्र રૂ૭ર द्वीपो-दधि-दिशा-वायु-स्तनितकुमारा स्तेषां नियोऽपि दशविधा भवन्तीति । 'से तं भवणवासि देवित्थियाओ' ता एता दशप्रकारा भवनवासिदेवत्रियो निरूपिता इति ॥ 'से कि तं वाणमंतरदेवित्थीओ' अथ कास्ता वानव्यन्तरदेवस्त्रियः, वानव्यन्तरदेवस्त्रीणां कियन्तो भेदाः, इति प्रश्नः, उत्तरयति-'वाणमंतरदेवित्थीओ अट्टविहाओ पन्नत्ताओ' वानव्यन्तरदेवस्त्रियोऽष्टविधाः अष्ट प्रकारकाः प्रज्ञप्ता--कथिता', तदेवाह-'तं जहा' तद्यथा-'पिसायवाणमंतरदेवित्थीओ जाव गंधव्यवाणमंतरदेविस्थीओ' पिशाचवानव्यन्तरदेवस्त्रियो यावद्गन्धर्ववानव्यन्तरदेवस्त्रियः, अत्र यावत्पदेन भूत -यक्ष-राक्षस-किन्नर-किंपुरुष-महोरगव्यन्तरदेवस्त्रीणा संग्रहः' 'से तं वाणमंतरदेवित्थीओ' ता एता वानव्यन्तरदेवस्त्रियः 'से किं तं जोइसियदेवित्थीओ' अग्निकुमार, द्वीपकुमार, उदधिकुमार, दिक्कुमार, वायुकुमार । भवनवासी दश प्रकार के होने के कारण इनकी स्त्रिया भी दस प्रकार की कही गई है। “से तं भवणवासिदेवित्थीओ इस प्रकार से यह भवनवासि देवस्त्रियों का कथन समाप्त हुआ “से किं तं वाणमंतरदेविस्थी मो, हे भदन्त ! वानव्यन्तरदेवस्त्रियां कितने प्रकार की होती है ? हे गौतम ! "वाणमंतरदेवित्थीओ अहविहाओ पण्णत्ताओ" वानव्यन्तर देवस्त्रियां वानव्यन्तरों के आठ प्रकार होने के कारण आठ प्रकार की होती है। वानव्यन्तरों के आठ प्रकार ऐसे होते हैं-पिशाच, भूत, यक्ष, राक्षस, किन्नर, कि पुरुष, महोरग और गन्धर्व यही बात 'पिसायवाणमंतरदेविस्थीओ जाव गंधव वाण मतरदावत्थोओ' इस सूत्रपाठ द्वारा स्पष्ट की गई है अतः पिशाचस्त्रियां भूतस्त्रियां यक्षस्त्रियां राक्षसस्त्रियां किन्नरस्त्रियां किंपुरुषस्त्रियां और गन्धर्व स्त्रियां यावत् पद से इन आठ पिशाच मादिकों का स्त्रियों का ग्रहण हुआ हैं । “से किं तं जोइसियदेवित्थीओ” हे भदन्त ! તકુમાર પણ સૂગ પાઠમાં કહેલજ છે, બાકીના આઠ નામ આ પ્રમાણે છે-નાગકુમાર સુવર્ણકુમાર વિદ્યકુમાર અગ્નિકુમાર દ્વીપકુમાર ઉદધિકુમાર, દિશાકુમાર અને વાયુકુમાર આ રીતે ભવનવાસી દેવો દશ પ્રકારના હોવાથી તેઓની સ્ત્રિ પણ દસ પ્રકારની જ ४स छे "से तं भवणवासिदेवित्थीओ' मी प्रमाणे मा सवनवासी वानी जियोनु नि३५ ४रेस छे से कि त वाणमंतर देवित्थीओ" लगवन् ! वानव्य त२ हेवेनी स्त्रियो मारनी डाय छे ? "गोयमा ! वाणमंतरदेवि स्थीओ अढविहाओ पण्णत्ताओ" गौतम ! वानव्यन्त२ हेवनी नियो, पानव्यन्तर दे। આઠ પ્રકારની હોવાથી આઠ પ્રકારની હોય છે, વાતવ્યન્તરના આઠ પ્રકારે આ પ્રમાણે છે पिशय, भूत, यक्ष, राक्षस, &िAR S३५, मा२०1, मने गधर्व मे पात "पिसाय वाण मंतरदेवियाआ जाव गधव्यवाणमंतरदेवित्थोओ" मा सूत्रमा द्वारा स्पष्ट ४२ छ तथी (५शाय (सया, सूत स्त्रियो, यक्षसियो, राक्षसखियो, २ सियो, ६ પુરૂષસ્ત્રિ અને ગંધર્વ સ્ત્રિયે યાવત્ પદની ઓ આઠ પિશાચ સ્ત્રિ ગ્રહણ કરવામાં આવેલ छ. “से किं तं जोइसियदेवित्थीओ” 8 सपन ज्योति हेवनी बिया टा प्रानी
SR No.010388
Book TitleAgam 14 Upang 03 Jivabhigam Sutra Part 01 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages693
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_jivajivabhigam
File Size44 MB
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