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________________ थूलभद्र चउमासा ३८६ " गिधु धौंकि दोंदों तिल वाजड़, झिमिकि रमिझिम घुग्घरा ॥ देशी दिखावे राग गावे, कठिण चित पिणि परधलइ । थूलभद्र चित भेद्यउ नही किम, मेरुगिरि चाल्यु चलइ ||१३|| थूलभद्र कहे कोश्या सुणउ, चिपय विषफल सारिखा । थकी लहीये नरक ना दुख, तेहनउ कोइ न सखा || प्रतिबोध देई सील समकित ऊचराव्यउ तास रे । कोश्या कहे धन धन्न थुलभद्र, मुझ दीयउ सुख वास रे ।। एहवा सज्जन थोडला, जे करे धर्म प्रकाश रे । मुनिराय निर्मल सील पाली, आविया गुरु पासिरे || गुरु कहे आदर मान देई, दुक्कर दुकर कार रे । मसि कोटडीमां वस्त्र निर्मल, रहे नहीं निरधार रे || इम शील पालइ धन्य ते नर, तास नमीये पाय रे । जिनहरख बारहमास भणतो, रिद्धि नव निधि थाय रे || १४ || श्री थूलभद्र चार महीना लिखितान्येतत्पत्राणि जिनहर्पेण । थूलभद्र चउमासा || ढाल चद्रायणानी || श्रावण आयउ साहिबा रे, झिरमिर वरसह मेहो । झव झव झवकड़ वीजली रे, दाझइ मोरी देहो || दाइ मोरी देह रे बाहा, हीयडड़ लागड़ तीखा भाला । 1 प्रिउ चीतारड़ चातक काला, मो विरहिणि ना कउंण हवाला ॥ १ जी ॥ पीयाजी रे तुमे कांड थयां निसनेह, सांभलि वातडी रे ।
SR No.010382
Book TitleJinaharsh Granthavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAgarchand Nahta
PublisherSadul Rajasthani Research Institute Bikaner
Publication Year1962
Total Pages607
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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