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________________ जैनागम स्तोक सग्रह बावीसवे बोले श्रावक के बारहवत': १ स्थूल (मोटी, बडी) जीवों की हत्या का त्याग करे २ स्थूल झूठ का त्याग करे ३ स्थूल चोरी करने का त्याग करे ४ पुरुष पर स्त्री-सेवन का व स्त्री पर पुरुष सेवन का त्याग करे ५ परिग्रह की मर्यादा करे ६ दिशाओ (में गमन करने) की मर्यादा करे ७ चौदह नियम व २६ बोल की मर्यादा करे ८ अनर्थदंड का त्याग करे ६ प्रतिदिन सामायिक आदि करे १० दिशावकाशिक (दिशाओं व भोगोपभोगो का परिमाण) करे ११ पौषध व्रत करे १२ निग्रंथ साधु व मुनि को प्रासुक व ऐषणीय आहारादि चौदह बोल प्रतिलाभे (अतिथि सविभाग व्रत करे)। तेवीसवे बोले साधुजी (मुनि) के 'पच महाव्रत'3 : १ सर्व हिसा का त्याग करे २ सर्व मृषावाद का त्याग करे ३ सर्व अदत्तादान (चोरी) का त्याग करे ४ सर्व मैथन का त्याग करे ५ सर्व परिग्रह का त्याग करे (मुनि के ये त्याग तीन करण व तीन योग से होते है ) १ पर वस्तु मे आत्मा लुभा रही है । अत. आत्मा को पर वस्तु से अलग कर स्वत्व मे कायम रहना अत है । २ पूर्वोक्त छ8 व्रत मे दिशा की और मातवे मे उपभोग परिभोग का जो परिणाम किया है वह जीवन पर्यन्त है परन्तु यह दिशावकाशिक प्रतिदिन का किया जाता है। ३ बडे व्रतो को-पूर्ण को महाव्रत कहते है । त्यागी मुनि ही इनका पालन कर सकते है, गृहस्थ नही।
SR No.010342
Book TitleJainagam Stoak Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMaganlal Maharaj
PublisherJain Divakar Divya Jyoti Karyalay Byavar
Publication Year2000
Total Pages603
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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