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________________ ७० जैनागम स्तोक संग्रह पाँचवें बोले पर्याप्ति५ छः १ आहार पर्याप्ति, २ शरीर पर्याप्ति, ३ इन्द्रिय पर्याप्ति, ४ श्वासोच्छ्वास पर्याप्ति, ५ भाषा पर्याप्ति, ६ मनः पर्याप्ति । छठे बोले प्राण दश : १ श्रोत्रेन्द्रिय बलप्राण, २ चक्षु इन्द्रिय बलप्राण, ३ घ्राणेन्द्रिय बलप्राण, ४ रसनेन्द्रिय बलप्राण, ५ स्पर्शेन्द्रिय बलप्रारण, ६ मनः बलप्राण, ७ वचन बलप्राण, ८ काय बलप्रारण, ६ श्वासोच्छ्वास बलप्राण, १० आयुष्य बल प्राण । सातवें बोले शरीर" पाँच : १ औदारिक, २ वैक्रिय, ३ आहारक, ४ तेजस्, ५ कार्माण । आठवे बोले- योग पन्द्रह : १ सत्य मन योग, २ असत्य मन योग, ३ मिश्र मन योग, ४ व्यवहार मन योग, ५ सत्य वचन योग, ६ असत्य वचन योग, ७ मिश्र वचन योग, ८ व्यवहार वचन योग, ६ औदारिक शरीर काय योग, १० औदारक मिश्र शरीर काय योग, ११ वैक्रिय शरीर काय योग, ५ आहारादि रूप पुद्गल को परिणमन करने की शक्ति (यन्त्र) को पर्याप्ति कहते है। ६ पर्याप्ति रूप यन्त्र को मदद करने वाले वायु (Steem) को प्राण कहते है। ७ जो नाश को प्राप्त होता हो या जिसके नष्ट होने से-अदृश्य होने से जीव का नाश माना जाता है उसे शरीर कहते हैं । ८ मन, वचन काया की प्रवृत्ति को, चपलता को (प्रयोग को) जोग (योग) कहते हैं।
SR No.010342
Book TitleJainagam Stoak Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMaganlal Maharaj
PublisherJain Divakar Divya Jyoti Karyalay Byavar
Publication Year2000
Total Pages603
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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