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________________ जन सुबोध गुटका। (३२५) छहंगा इसे तुझको न मूर्ख शमें है ।बुरी बातों से पेश तु श्रावे मती ।। २ ॥ वास खाती सिंहनी नहीं, खायगा खज़ होज भी। लंधन. करेगी वह मगर, तृण न चाहेगी कभी। मेरे आगे तू जाल फैलावे मती ॥ ३॥ छोड़के इन्सानपन तू क्यों बना नादान है । कहे चौथमल दिन चार का दुनियां में तु महमान है । वदी बांध के साथ ले जावे मती ॥ ४ ॥ नंबर ४४० " (तर्ज-शिक्षा दे रहीजी हमको रामायण ! .. शिक्षा धारियों रे, हमारे देश के प्रेमी बन्धु ।।ध्रुवीयाटा गिन्नी का मत खाओ, इसमें दोष है भारी | ताकत हीन बनावे, तुमको, धर्म न रहे लगारी ॥ १॥ कीड़ों की होती है हिंसा, इस रेशम के काज,थोड़े शोक के कारण प्यारो, मतना करो अकाज ।। २ ॥ हिंसाकारी वस्त्र विदेशी, मत तुम हरगीज,धारो। खादी देश की हैं श्राबादी, इसको मति विसारो ॥ ३ ॥ सस्ता जान के ची मिश्रित, घी कभी मत खाओ। नकली घी से असली ताकत, कहो कहां से लाभो ॥४॥ संवत् उन्नीसे साल सित्यासी, शहर सतारा माई । गुरु प्रसादे चौथमल कहे, मुनियों ध्यान लगाई ॥ ५॥
SR No.010311
Book TitleJain Subodh Gutka
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChauthmal Maharaj
PublisherJainoday Pustak Prakashan Samiti Ratlam
Publication Year1934
Total Pages350
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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