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________________ ८. समपाद-एकपाद-गृध्रोड्डीन-कायोत्सर्गादीनि ऊर्ध्वस्थानम् ।। ६. गोदोहिका-उत्कटुक-समपादपुता-गोनिषधिका-हस्तिशुण्डिका-पद्मवीर सुख-कुक्कुट-सिद्ध-भद्र-वज्र-मत्स्येन्द्र-पश्चिमोत्तान-महामुद्रासंप्रसारण भूनमन-कन्दपीडनादीनि निषीदनस्थानम् ॥ १०. दण्डायत-आम्रकुब्जिका-उत्तान-अवमस्तक-एकपार्श्व-ऊवंशयनलकुट मत्स्यपवनमुक्त-भुजंग-धनुरादीनि-शयनस्थानम् ॥ ११. सर्वाग शीर्षादीनि विपरीत क्रियापादकानि॥ ६ विधिवत् शरीर को स्थिर वनाकर बैठना स्थान-आसन कहलाता है। यह कायगुप्ति है। ७. स्थान तीन प्रकार के होते है १. ऊर्ध्व-स्थान २. निपीदन-स्थान ३. शयन-स्थान। ८. खडे होकर किए जाने वाले स्थानो का नाम 'उर्ध्व-स्थान' है। उसके कुछ प्रकार ये है१. समपाद ३ गृध्रोड्डीन २. एकपाद ४ कायोत्सर्ग। ६. बैठकर किए जाने वाले स्थानो का नाम 'निषीदन स्थान' है। उसके कुछ प्रकार ये है१. गोदोहिका ६. कुक्कुटासन २ उत्कटुकासन १०. सिद्धासन ३. समपादपुता ११. भद्रासन ४. गोनिपधिका १२ वज्रासन ५. हस्तिशुण्डिका १३. मत्स्येन्द्रासन ६. पद्मासन १४ पश्चिमोत्तानासन ७. वीरासन १५ महामुद्रा ८ सुखासन १६. सप्रसारणभूनमनासन १७ कन्दपीडनासन। १०. लेटकर किए जाने वाले स्थानो का नाम 'शयन-स्थान' है। उसके कुछ प्रकार ये है मनोनुशासनम् । ५१
SR No.010300
Book TitleManonushasanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya
PublisherAdarsh Sahitya Sangh
Publication Year1998
Total Pages237
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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