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________________ रावण वध | ३३५ आया । उसने रामको सिंहनिनादा नामा विद्या, मूसल रथ - और हल दिये । और लक्ष्मणको, गारुडी विद्या, रथ और रणमें शत्रुओं का नाश करनेवाली विद्युद्वदना नामकी गढ़ा दी । इनके अतिरिक्त उसने आग्नेय व वायव्य आदि दूसरे दिव्य अस्त्र और छत्र भी उनको दिये । देव चला गया । लक्ष्मण भामंडल और सुग्रीवके निकट गये । उनके वाहन गरुडको देखते ही हनुमान और भामंडलके लिपटे हुए नागपाशके नाग तत्काल ही भाग गये । दोनों वीर मुक्त हुए । रामकी सेनामें चहुँ ओरसे जयनाद सुनाई देने लगा | राक्षसोंकी सेनामें सूर्यास्तकी भाँति अफ्सोसका अँधेरा छागया । रावणका युद्धमें प्रवृत्त होना । तीसरे दिन सवेरे ही राम और रावणकी सेना फिरसे, 'पूर्ण बल के साथ रणभूमिमें आई | भयंकर युद्ध आरंभ हुआ | चलते हुए अ ऐसे ज्ञात हो रहे थे; मानो यमराजके दाँत हिल रहे हैं । प्राण संहारकी लीलाको देखकर ऐसा जान पड़ता था; मानों अकालमें ही प्रलयकालका संवर्त मेघ बरसने लगा है । मध्यान्ह कालके तापसे तपे हुए वराहोंके द्वारा कुस्थिति प्राप्त सरसी - जलाशय - की भाँति क्रुद्ध राक्षसोंने वानर सेनाको घबरा दिया । • अपनी सारी सेनाको भग्नमायः हुई देखकर, सुग्रीवादि * मूसल और हल बलदेवके मुख्य शस्त्र हैं ।
SR No.010289
Book TitleJain Ramayana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKrushnalal Varma
PublisherGranthbhandar Mumbai
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size31 MB
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