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________________ १५६ | जैन कथामाला (राम-कथा) ने अपनी रानी अमृतप्रभा से उत्पन्न पुत्री अपराजिता का विवाह उनके साथ कर दिया । राजा सुकोशल की पुत्री होने के कारण अपराजिता का दूसरा नाम कौशल्या भी था । कौशल्या रूप और लावण्य में अग्रगण्य राजकुमारी मानी जाती थी । राजा दशरथ का दूसरा विवाह कमलसंकुल नगर के राजा सुबन्धुतिलक की पुत्री से हुआ । राजा सुवन्धुतिलक की पुत्री का नाम था कैकेयी' और वह रानी मित्रादेवी की कुक्षि से उत्पन्न हुई। इसका लोक प्रचलित नाम सुमित्रा था । इसके पश्चात राजा दशरथ ने सुप्रभा नाम की उत्तम सुन्दरी राजकन्या से विवाह किया। अपनी तीनों रानियों के साथ दशरथ उत्तम सुख भोगते और न्यायनीति पूर्वक राज्य-संचालन करते थे । एक दिन राजा दशरथ अपनी राज्य सभा में बैठे थे कि देवर्षि नारद वहाँ आये । दशरथ ने सिंहासन से उठकर उन्हें नमस्कार किया और सम्मानपूर्वक उचित आसन पर बिठाया । दशरथ ने देवर्षि से मधुर शब्दों में पूछा - देवर्षि ! कहाँ से आ रहे हैं ? —कहाँ से बताऊँ राजन् ! मैं तो पृथ्वी पर भ्रमण करता हो रहता हूँ । - फिर भी नारदजी, कुछ तो वताइये । - तो सुनो नरेश ! विदेह क्षेत्र की पुष्करिणी नगरी में सुर-असुर १ कैकेयी के मित्राभू, सुशीला और सुमित्रा आदि कई नाम थे । यह सुमित्रा के नाम से प्रसिद्ध हुई और यही वासुदेव लक्ष्मण की जननी थी । - त्रिपष्टि शलाका ७१४ यह भरत जननी कैकेयी नहीं थी । - सम्पादक - भ
SR No.010267
Book TitleJain Kathamala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Shreechand Surana
PublisherHajarimalmuni Smruti Granth Prakashan Samiti Byavar
Publication Year1977
Total Pages557
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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