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________________ नवम अध्याय 31.1 काम-भोगाभिलापाणां नित्यं चातिप्रवृद्धता। . जिनस्यासादनं साधुसमयस्य च भेदनम् // 24 // मार्जारताम्रचूडादिपापीयःप्राणिपोपणम् / / नैःशील्यं च महारम्भपरिग्रहतया सह // 25 // कृष्णलेश्यापरिणतं रौद्रध्यानं चतुर्विधम् / भायुपो नारकस्येति भवन्त्यावहेतवः // 26 // अत्यन्त अधिक मान रखना, पाषाणकी रेखाके समान क्रोध करना, मायाचार करना, तीव्र लोभ रखना, निरन्तर निर्दय परिणाम रखना, सदा जीवघात करना, सदा झूठ बोलना, सदा पराये धनको हरना, नित्य मैथुन सेवन करना, काम भोगोंकी नित्य बढ़ती हुई अभिलाषा रखना, जिन भगवान्की आसादना करना, साधुओंकी परम्पराका और जैन-शासनका भेद करना, बिल्ली, मुर्गा, कुत्ता आदि पापी ( हिंसक) प्राणियोंका पालन करना, व्रत, शील आदि कुछ नहीं पालन करना, महाआरम्भ और परिग्रह रखते हुए कृष्णलेश्यासे युक्त मनोवृत्ति रखना, हिंसानन्द, मृषानन्द, चौर्यानन्द और परिग्रहानन्द ये चार प्रकारका रौद्रध्यान रखना इत्यादि कार्य नारकायुके आस्रवके कारण हैं // 22-26 // * अब एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय तथा पशु-पक्षियोंमें, उत्पन्न करनेवाले तिर्यंच-आयुकर्मके आस्रवके कारण कहते हैं नैःशील्यं नितत्वं च मिथ्यात्वं परवञ्चनम् / . मिथ्यात्वसमवेतानामधर्माणां च देशनम् // 27 // कृत्रिमागुरुकपूरकुङ्कुमोत्पादनं तथा। तथा:मानतुलादीनां कूटादीनां प्रवर्तनम् // 28 //
SR No.010233
Book TitleJain Dharmamruta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1965
Total Pages177
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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