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________________ २०० करते हुए जिस कृत्यको श्रावक-हृदय शरमायेंगे, उपदेश देकर दूसरोंसे वे उसे करवायेंगे। हा. हा. लजाते आजकल सब ब्रह्मचारी वेषको, नित शान्तिके ही नामपर पैदा करेंगे क्लेशको । २०१ थों बन गये हैं ब्रह्मचारी कर्मको जाना नहीं, जिस धर्मके पालक स्वयं सचा उसे माना नहीं। जो आ गया इस चित्तमें उपदेश वह देने लगे, वाग्वीर धन करके कलहके बीजको धोने लगे। २०२ हैं ब्रह्मचारी और यह यौवन भरा है गातमें, अवलोकने निज-कामिनीको वे अन्धेरी रातमें। रहते व्यथित अत्यन्त ही हा, मारकी दुारसे, प्रच्छन्न तब वे जोड़ते सम्बन्ध इस संसारले । भट्टारक। एक दिन अकलकसे विद्वान् भट्टारक हुये. निज शक्तिसे जो लोकमें प्रभु-धर्म संचालकहुये। अह, आज महारक यहां रखते परिग्रह भारको, भगराजकी उपमा अलौकिक मिल रहीमारिको।
SR No.010211
Book TitleJain Bharati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGunbhadra Jain
PublisherJinwani Pracharak Karyalaya Kolkatta
Publication Year1935
Total Pages188
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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