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________________ दिगम्बर जैन साधु क्षुल्लिका विशालमती माताजी [ ५८१ आपका जन्म ग्राम चोंकाक जिला कोल्हापुर दक्षिण प्रांत में हुआ । चार वर्ष की छोटी आयु में आपका विवाह हुआ तो आप मंडप से बाहर निकल गई और फेरे नहीं हुए । एक वर्ष के पश्चात् उस लड़के का स्वर्गवास हो गया । माँ ने कहा पुत्री विधवा हो गई । चौदह वर्ष की आयु में परम पूज्य आचार्य शांतिसागरजी महाराज से ब्रह्मचर्यं दीक्षा ले ली । ट्रेनिंग पास कर श्रध्यापिका का कार्य करने लगीं । आपकी समाज सेवा में बड़ी रुचि रही 'महिला वैभव' नाम की मासिक पत्रिका की सम्पादिका रहीं और एक 'कन्याकुमार पाठशाला' की स्थापना की । वोरगांव में आचार्य पायसागरजी से क्षुल्लिका दीक्षा धारण की। आप बड़ी कष्ट सहिष्णु सहनशील और कुशल वक्ता हैं । क्षुल्लिका गुरणमती माताजी में श्रापका जन्म अग्रवाल वंश में गुहाने के प्रसिद्ध रईस ला० हुकमचन्दजी के यहाँ हुआ | आप के पिताजी ने ब्रह्मचर्य दीक्षा ले ली। उनकी धार्मिकता के कारण आज आपका समस्त परिवार धार्मिक, शिक्षित और श्रद्धालु है । सदैव धर्म के कार्यों में प्रयत्नशील रहती हैं । बचपन में बड़े लाड चाव से पालन पोषण होने के कारण आप का नाम 'चावली' रखा गया । दुर्भाग्य से थोड़ी आयु विधवा हो गई। थोड़े ही समय में धार्मिक विषयों में उत्तम योग्यता प्राप्त करली । आपने गुहाने में ज्ञान वनिताश्रम खोला जिससे नारी जाति का बड़ा उपकार हुआ। बहुत वर्षों से आप दिल्ली रहने लगों । आपके चारित्र और ज्ञान प्रचार की तीव्र रुचि के कारण दिल्ली महिला समाज पर बड़ा ही प्रभाव पड़ा । जैन महिलाश्रम दिल्ली की आप अधिष्ठातृ थीं । 1 1 पाँच वर्षं हुए परम पूज्य श्राचार्य वीरसागरजी महाराज से क्षुल्लिका दीक्षा धारण की आपने दरियागंज में ज्ञान महिला विद्यालय स्थापित किया । जिससे समाज का बड़ा उपकार हुआ। आप अस्वस्थ होते हुए भी चारित्र का पालन दृढ़ता से करती हैं ।
SR No.010188
Book TitleDigambar Jain Sadhu Parichaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDharmchand Jain
PublisherDharmshrut Granthmala
Publication Year1985
Total Pages661
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size31 MB
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