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संक्षेपशारीरक पर अन्वयार्थ प्रकाशिका, शङ्कराचार्य की उपदेश साहस्री पर पदयोजनिका और वेदान्तसार पर विद्वनमनोरंजनी नामक टीका ग्रन्थों में रामतीर्थ ने विशेषतया अद्वैतवाद का ही प्रतिपादन किया है।
इसी समय आपदेव नाम मीमांसक भी थे जिन्होंने वेदान्तसार पर बोलबोधिनी नामक टीका की रचना करके अद्वैत मत का ही पूर्ण रूप से समर्थन किया है। मुख्य बात यह है कि यह मीमांसक होते हुये भी अद्वैत मत के समर्थक थे।
१७वीं शताब्दी में गोविन्दानन्द ने ब्रह्मसूत्र भाष्य की टीका- रत्नप्रभा शाङ्कर भाष्य की टीका है। इन्होंने भी अद्वैत वेदान्त का बड़ी सरलता से अपने ग्रन्थ में निरूपण किया है। रामानन्द सरस्वती (१७वीं शताब्दी)
रामानन्द सरस्वती शंकरोत्तर वेदान्तियों में प्रमुख थे जिन्होंने अद्वैतवाद के विकास में पूर्ण रूप से प्रयास किया। ये गोविन्दानन्द के शिष्य थे इन्होंने ब्रह्मसूत्र पर शांकर भाष्य सम्मत 'ब्रह्मामृतवर्षिणी' नामक टीका की रचना की है। इसके अतिरिक्त 'विवरणोपन्यास' नामक ग्रन्थ भी अत्यधिक प्रसिद्ध है। यह ग्रन्थ पंचपादिका टीका का विस्तृत रूप है। काश्मीरक सदानन्द यति (१७वीं शताब्दी)
काश्मीरक सदानन्द यति ने काश्मीरक अद्वैत ब्रह्मसिद्धि नामक एक प्रामाणिक ग्रन्थ की रचना किये। वामनशास्त्री ने इसका संपादन किया है। इनके अन्य ग्रन्थ जैसे- अद्वैतसिद्धि सिद्धान्त सार, प्रत्यक्तत्त्व चिन्तामणि (प्रभासहित) ईश्वरवा, स्वरूप निर्णय, स्वरूपप्रकाश, गीताभाव प्रकाश (पद्य), तत्त्वविवेक टीका और शङ्कर दिग्विजयसार आदि। ये मधुसूदन सरस्वती के सिद्धान्तबिन्दु के टीकाकार ब्रह्मानन्द
'यह परिमल प्रकाशन दिल्ली से १६८१ में छपी है।
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