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मैक्समूलर का कथन है कि भारत में तत्वचिन्तन ज्ञान की उपलब्धि के लिये नहीं अपितु उस परम उद्देश्य की सिद्धि के लिये किया जाता था, जिसके लिये मनुष्य का इस लोक में प्रयत्न करना संभव है। दर्शन एवं धर्म
सभ्यता के आदिम काल से ही विश्व के सभी देशों में धर्म की चर्चा होती रही है। कई स्थलों पर धर्म के साथ दर्शन भी जुड़ गया है। और विश्व की सभी जातियों में किसी न किसी रूप में धर्म का अस्तित्व सदा से मान्य रहा है।
धर्म का लोकपक्षीय रूप सदा ही आचार एवं व्यवहार का सम्बल लेकर चलता रहा है। बड़े विचारको बुद्धिजीवियों और वैज्ञानिकों ने अपने जीवन के उत्तर-काल में किसी अतिप्राकृतिक सत्य या अन्य सार्वभौम सत्ता के प्रति जो आस्था प्रगट की है उससे लगता है कि मानव बिना किसी अतिप्राकृतिक सत्ता के प्रति आस्था रखे जीवन में चल ही नहीं सकता है। भारतीय-दर्शन में चार प्रकार के पुरूषार्थो का वर्णन मिलता है- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । धर्म के विषय में कहा जाता है कि यह मूलरूप से एक रचनात्मक उदात्त वृत्ति है। धर्म एक है, और वास्तव में धर्म की पहचान इसी से होती है कि वह सार्वलौकिक होता है, व्यक्ति के दृष्टिकोण को विराट बनाता है तथा प्रेम एवं सौहार्द के द्वारा ही संसार के समस्त प्राणियों में एकता के भाव भरने का भावनात्मक प्रयास करता है।
विवेकानन्द साहित्य (द्वितीय खण्ड) में कहा गया है कि धर्म कहीं बाहर से नहीं आता हैं वरन् व्यक्ति के आभ्यन्तर में ही उदित होता है। "धर्म" शब्द का प्रयोग किसी एक अर्थ में न करके भिन्न-भिन्न अर्थों में किया जाता है "यथा इस शब्द का प्रयोग स्वभाव, कर्तव्य, गुण, सत्कर्म, सत्य, ईमान, सम्प्रदाय, कानून, पुण्य, आदि अर्थों में होता है। "धर्म" शब्द के अनेक अर्थो में प्रयुक्त होने के कारण आज आम आदमी धर्म के
'व्यास, रामनारायण : धर्म दर्शन, म० प्र० हिन्दी ग्रन्थ अका०, भोपाल १६७१, पृ० ५३.