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जीवन में धर्म और सामाजिक परम्परा की महत्ता दार्शनिक ज्ञान के मुक्त अनुसरण में विघ्न उपस्थित नहीं करती है। यह एक विरोधाभास उपस्थित करता है। किन्तु यह अकाट्य सत्य है, क्योंकि जहां एक ओर किसी व्यक्ति का समाजिक जीवन जन्मगत जाति की कठिन रूढि से जकड़ा हुआ है। वहां ऐसे अपना मत स्थिर करने में पूरी स्वतंत्रता प्राप्त है। कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी जाति, धर्म, सम्प्रदाय में जन्म हो, तर्क द्वारा वह अपने धर्म सम्प्रदाय की समीक्षा कर सकता है। यही कारण है कि भारत में विधर्मी या धर्मभ्रष्ट, संशयवादी, नास्तिक, हेतवादी एवं स्वतंत्र विचारक, भौतिकवादी एवं आन्नद वादी सभी फलते-फूलते रहे हैं।
महाभारत में एक स्थान पर यह उद्धरण मिलता है कि ऐसी कोई भूमि नहीं जो अपनी भिन्न सम्मति न रखता हो। इस प्रकार भारत में दर्शन का विकास केवल बौद्धिक जिज्ञासाओं की शान्ति के लिये नहीं हुआ बल्कि इसका विकास एक विशिष्ट उद्देश्य की प्राप्ति के लिये हुआ। यह उद्देश्य था जीवन में दार्शनिक चिन्तन से प्राप्त ज्ञान को उपयोगी बनाना, दार्शनिक ज्ञान को जीवन की समस्याओं को सुलझाने में प्रयुक्त करना। इस कारण 'भारतीय दर्शन' 'पाश्चात्य दर्शन' की फिलॉसफी से भिन्न है। जहाँ फिलॉसफी की उत्पत्ति बौद्धिक पिपासा की तृप्ति के लिये हुई है, वहाँ दर्शन जीवन की समस्याओं को हल करने के लिये उत्पन्न हुआ है। यह निर्विवाद सत्य है कि भारतीय दार्शनिक मनीषियों ने तत्त्व-ज्ञान प्राप्त करने के बाद उसे गोपनीय एवं रहस्य बनाकर नहीं रखा, बल्कि उसे जीवन यापन का माध्यम बनाते थे और दूसरों के कल्याण का साधन बनाना चाहते थे। इस सन्दर्भ मे बौद्ध दर्शन मे बोधिसत्व और भारतीय दर्शन मे जीवन मुक्ति की अवधारणा का विकास हुआ। भारतीय दार्शनिको ने तत्वज्ञान को केवल अपने तक ही सीमित नही रखा बल्कि उसे परोपकार के लिये प्रयुक्त किया।