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अष्टवर्षे चतुर्वेदी द्वादशे सर्वशास्त्रवित् ।
षोडशे कृतवान् भाष्यं द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात् ।। इस सूक्ति के अनुसार आठ वर्ष की आयु तक शङ्कराचार्य ने चारों वेदों का अध्ययन कर लिया और बारह वर्ष तक षडाङ्ग वेदों का गूढ़ ज्ञान प्राप्त किया और अध्ययन-अध्यापन कार्य में तत्पर हो गये, सोलह वर्ष की उम्र में उन्होने वादरायण के ब्रह्म-सूत्र पर शारीरिक भाष्य लिखा और ३२ वर्ष में उनके जीवन की इह लीला समाप्त हो गयी। जीवन चरित्र के आधार पर ग्रन्थ
आचार्य शङ्कर का जीवन चरित्र लिखने की तरफ बहुत से विद्वानों ने प्रयास किया। पद्मपाद ने शङ्करदिग्विजय का वर्णन अपने ग्रन्थ 'विजयडिण्डिम' मे किया। किन्तु यह ग्रन्थ आज उपलब्ध नहीं है। किसी भी समसामयिक विद्वान ने भी शंकर के विषय में नहीं लिखा।
जो कुछ भी हो आचार्य के जीवन से सम्बद्ध अनेक ग्रन्थों की रचना समय-समय पर होती आई है। जिनमें दो चार भी छपकर प्रकाशित हुये हैं, और अन्य ग्रन्थ हस्तलिखित रूप मे ही हैं। शङ्कर विजय
डा० औफेक्ट की सूची के अनुसार इन का नाम नीचे दिया जाता है१. शङ्कर दिग्विजय- रचयिता माधव (हिन्दी अनुबाद के साथ प्रकाशित हरिद्वार)। २. शङ्कर दिग्विजय- आनन्द गिरि (मुद्रित, कलकत्ता)। ३. शङ्कर विजय- चिद्विलास (ग्रन्थाक्षर में मुद्रित)। ४. शङ्कर विजय- व्यास गिरि | ५. शङ्कर विजय- सदानन्द (मुद्रित, काशी)।
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