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संसार को असार संसारिक सुख को क्षणिक और अनित्य मानते हैं । सारा जीवन दुःख से पूर्ण है ('दुःखमेवसर्वविवेकिनः'- योग सूत्र) इस प्रकार दुःखों से मुक्ति पाना ही मानव का कर्तव्य है। महात्माबुद्ध के चार आर्य सत्य मे प्रथम आर्यसत्य ही दुःख है। भगवान बुद्ध ने उपदेश देते हुये कहा है भिक्षुओं चिरकाल तक माता के मरने का दुःख सहा है, सम्पत्ति के विनाश का दुख सहा है। उन माता के मरने का दुःख सहने वालों ने संसार में बार-बार जन्म लेकर प्रिय के वियोग और अप्रिय के संयोग के कारण रो-पीटकर आँसू बहाए हैं। इस प्रकार भिक्षाओं दीर्घकाल तक दुःख का अनुभव किया है। बड़ी-बड़ी हानियाँ सही है । पूमसान भूमि को पाट दिया है। अब तो सभी संस्कारों से निर्वेद प्राप्त करो, वैराग्य प्राप्त करो, मुक्ति प्राप्त करो।
भारतीय दर्शन के इस शोक, दुःखमय दृष्टि को देखकर ही पाश्चात्य दार्शनिक इस पर निराशावादी होने का आरोप लगाते हैं, किन्तु यह आरोप उचित नहीं है, निराशावाद भारतीय दर्शन का केवल प्रारम्भिक स्वरूप है, अन्तिम स्वरूप नहीं । किन्तु यह भी विचारणीय है कि भारतीय दार्शनिक दुःखों को देखकर (बताकर ) मौन नहीं हो जाते हैं बल्कि उसको दूर करने का उपाय भी बताते हैं ।
भगवान बुद्ध के चार आर्य सत्यों में जहाँ पहला आर्य सत्य यह कहता है कि “दुख है” वहीं दूसरा दुःख का कारण, तीसरा दुःख का निरोध और चतुर्थ दुःख निरोध का मार्ग है
इस प्रकार बुद्ध ने कहा है कि भिक्षुओं चार आर्य सत्यों को भली-भाँति जानने के कारण दीर्घकाल से मेरा और तुम्हारा संसार में चक्कर काटना और दौड़ना जारी रहा है। अविद्या में पड़कर जन्म-मरण के चक्कर में सभी लोग फंसे रहते हैं । दुःखों का अन्त ही निर्वाण है और मोक्ष सभी प्रकार के क्लेशों का अन्त है ।
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