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"हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये।।" अर्थात सूर्यमण्डल में सत्य (तत्त्व ब्रह्म) का मुख प्रकाशमय पात्र से ढका है। हे पूषन्! मुख्य सत्याधर्मी को आत्मा की उपलब्धि के लिये तू उसे उघाड़ दे अर्थात पात्र को सामने से हटा (जिससे मुझे सत्य तत्त्व का साक्षात्कार हो सके)।
ईशोपनिद् के उपर्युक्त मंत्र से स्पष्ट होता है कि सत्य को अनावृत कर तत्त्व का साक्षात्कार करना ही दर्शन है। चर्मचक्षुओं से सत्य का साक्षात्कार न होकर आन्तरिक चक्षुओं से होता है।
गीता में दिव्यचक्षु का वर्णन मिलता है। शोक सागर में निमग्न और मोहान्ध अर्जुन को श्रीकृष्ण स्वजन सखा सहायक और संरक्षक दिखलायी पड़ते थे। ग्यारहवें अध्याय में भगवान कृष्ण ने उन्हे दिव्य दृष्टि प्रदान की
"दिव्य ददामि ते चक्षुः पश्य में योगमैश्वरम् । दिव्य दृष्टि प्राप्त होने के बाद अर्जुन को अब श्रीकृष्ण सगा सम्बन्धी ही नहीं परम पुरुष, पुराण पुरुष, परमात्मा, परमपिता, देव, देवाधिदेव, महादेव, सम्पूर्ण सृष्टि के कर्ता, धर्ता और संहर्ता सबकी गति, स्थिति और विनाश के कारण दिखालायी देने लगे। अब अर्जुन सभी भूतो में भगवान् (कृष्ण) और भगवान् (कृष्ण) में सभी भूतों को देखने लगे। यह दिव्यदर्शन का ही फल है।
"पश्यामि देवास्तव देव देहे सर्वास्तया भूत विशेष संधान्।
ब्रह्माणभीशंकमलासनस्थ मृषीश्च सर्वानु रंगाश्च दिव्यान् ।।" गीता ११/१ भारतीय दर्शन का आरम्भ या उत्पत्ति
बहुधा दार्शनिकों के मतानुसार भारतीय दर्शन की उत्पत्ति का प्रबल कारण आध्यात्मिक असंतोष है। चार्वाक दर्शन को केवल छोड़कर सभी भारतीय दार्शनिक
1ईशोपनिषद् मंत्र १५
गीता ११/८