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है। किन्तु तीन और आचार्यों अचार्यों का नाम 'ब्रह्मसूत्रभाष्य' से ज्ञात होता है। यथा ब्रह्मसूत्रभाष्य में १. व्यास २. उपवर्ष (बोधायन, कृतकोटि) ४. गुहदेव, ४. कपर्दी ५. भारुचि ६. बह्मानन्दी (टङ्का) ७. द्रविण, ८. भर्तृप्रपञ्च, ६. भर्तृमित्र, १०. भर्तृहरि,११ ब्रह्मदत्त १२. सुन्दर पाण्ड्य १३. गौडपादाचार्य १४. मण्डनमिश्र ।
इसमें से कुछ ने वेदान्त विषयक सूत्रों की ,कुछ भाष्यों की ,कुछ वृत्तियों की, कुछ के द्वारा कारिका और व्याख्यादि की रचना की गयी।
व्यास
भगवान व्यास ब्रह्मसूत्र के कर्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनके मत में अद्वैतवाद का स्वरूप कैसा था? यह निर्णय करना अति दुष्कर है। कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास का नाम ही वादरायण माना जाता है किन्तु विद्वानों के बीच विवाद का यह विषय है कि ब्रह्मसूत्र कर्ता वादरायण और व्यास एक ही व्यक्ति हैं या अलग-अलग व्यक्ति हैं या एक ही व्यक्ति के दो नाम हैं?
ब्रह्मसूत्र में नौ' स्थलों पर वादरायण नाम का निर्देश जिस रूप में किया गया है उससे यह संकेत मिलता है कि इन सूत्रों का रचयिता वादरायण है। इस मान्यता को स्वीकार करने में कोई आपत्ति दृष्टिगोचर नहीं होती है किन्तु आचार्य वादरायण के प्रभाव को लेकर मतवैविध्यता हैं।
पाणिनि नें उनाका नामोल्लेख 'पराशर्य ' के नाम से किया है। इस कारण इनका काल ई० पूर्व ६७५ से २०० ई० पू० तक का माना जाता है। वादरायण २०० ई० पूर्व के आस-पास अवश्य थे क्योंकि उन्होंने बौद्धों के सर्वास्तिवाद और विज्ञानवाद का खण्डन किया है जिनका उद्भव १०० ई० पूर्व में हुआ था।
ब्रह्मसूत्र । १२२६१, १२॥३३१,३।२।४१, ३,४१, ३४८, ३।४।१६, ४।३।१५, ४।४७.४।४।१२
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